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सकीना और असग़र

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कर्बला  ये नाम नही पेन किलर है। अगर कर्बला ना होती तो शायद हम अपने अज़ीज़ों के ग़म को भूला नही पाते। कर्बला में ईमाम हुसैन अस. ने हर उम्र की क़ुर्बानी देकर हमारे ग़मो को ज़ब्त कर लिया। छह महीने के अली असग़र से लेकर पचहत्तर साल के हबीब इब्ने मज़ाहिर तक कि क़ुर्बानी।  हमे जब भी अपने किसी अज़ीज़ की तक़लीफ़ सताती है हम कर्बला को याद कर लेते हैं। बच्चा मारा तो  छह माह के जनाबे अली असग़र को याद कर लिया बेटा मरा तो अठारह साल के जनाबे अली अकबर को याद कर लिया, भतीजा मरा तो हमने तेरह साल के जनाबे क़ासिम को याद कर लिया, भांजा मरा तो हमने 9 साल के औन ओ मोहम्मद के ग़म को याद कर लिया। दोस्त मरा तो हबीब इब्ने मज़ाहिर को याद कर लिया, भाई मरा तो हमने हज़रत अब्बास को याद कर लिया। बच्ची मरी तो शाहज़ादी सकीना को याद कर लिया। कर्बला ने हमारे ज़ख़्मो के लिए जो मरहम तैयार किया था वो क़यामत तक हमारे ज़ख़्मो को कम करता रहेगा। लेकिन कुछ ग़म ऐसे होते हैं जिसका दर्द ज़िन्दगी भर रहता है। उस ग़म का बोझ इतना ज़्यादा होता है कि बाप की क़मर झुक जाती है अगर किसी का जवान बेटा गुज़र जाए। वो बाप उम्र से पहले बूढा हो जाता है।...