अदब ओ तहज़ीब के दायरे में शायरी होनी चाहिए। अहलेबैत अस. तू तड़ाक नही करते।
शायरों और ज़ाकिरों कि है ये तू तड़ाक की भाषा है । रसूलअल्लाह स.अ से लेकर आले रसूल स.अ के नामों में अदब ओ तहज़ीब को बिल्कुल ख़त्म करके अपने रदीफ़ ओ क़ाफ़िया के लिए बहर के अंदर शेर कहने के लिए और ज़ाकिरों को आसानी के लिए ईजाद किया गया है तू तड़ाक। चाहे किसी अम्बिया अस. से ख़ुदा मुख़ातिब हो या रसूल आले रसूल किसी से क़लाम कर रहे हो उसमे शायरों ज़ाकिरों,ख़ातिबों ने और अनुवादक ने तू तड़ाक से ही मुख़ातिब किया। भला जिसके इल्म का मयार इतना बुलन्द हो वो अपने से बड़े को तू कहेगा ? हर्गिज़ नही, ये शायरों और ज़ाकिरों कि ज़बान हो सकती है अम्बिया, ख़ुदा, रसूल (स) और आले रसूल अस. की बिल्कुल नही। शहज़ादी सकीना अपने बाबा से तुम कहेंगी ? हज़रत ईमाम हुसैन अस. अपने बच्चे को तू कहेंगे ? हर्गिज़ नही जिसके घर की इल्म मीरास हो उस घर के बच्चे अपने से बड़े को तू तड़ाक हर्गिज़ नही करेंगे अदब ओ तहज़ीब का एक मयार था जो धीरे धीरे शायरों ने ख़त्म कर दिया। क्या हो जाएगा अगर आप लोग "तू" तुम" की जगह आप लफ़्ज़ को इस्तेमाल कर लेंगे ? आज कल के नौहाख्वां और ख़तीब भी बारीक़ी पर बिल्कुल ग़ौर नही करते हैं कि किसके नाम ...