अमेरिका-ईरान-इज़राइल की जंग क्यों है ? चलते है इतिहास के पन्नों में छुपे राज़ में
3 जनवरी 2023 को ईरानी कमांडर शहीद क़ासिम सुले-मानी की हत्या करके इज़राइल दुश्मन तो पहले ही बन गया था लेकिन ग़ाज़ा पे हमले के बाद अक्टूबर 2023-2024 से सीधा मुक़ाबला ईरान से इज़राइल और अमेरिका का होगया।
दुनिया की नज़र में ये जंग हथियारों, सामरिक शक्तियों और साम्रज्य विस्तार की लग सकती है।
परमाणु सम्पन्न देश बनने से ईरान को रोकना
ईरान की सत्ता पलट करवा कर शाह पहलवी को बैठाना।
दुनिया को ये दिखाना की ईरान ने पाबंदियां लगाई है, शरई क़ानून चल रहा, इस्लामिक क़ानून की वजह से लोगों की आज़ादी छीन गयी है।
तेल पर कब्ज़ा करना वग़ैरह वग़ैरह।
लेकिन सच्चाई कुछ और है।
अगर बात करे तेल की तो ख़ुद अमेरिका कहता है कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए पेट्रोल डीज़ल पे निर्भरता कम करके ग्रीनहाउस गैसों को मज़बूत बनाना है।
एको फ्रेंडली गाड़ियां बना रहा है, लिथियम बैट्री से चलने वाली इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल को बढ़ावा दिया जा रहा है।
तेल का मसला ही नही है। ईरान में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुर मात्रा है, अगर तेल चला भी गया तो बहुत सारे संसाधन है।
ईरान ये बात अच्छी तरह जानता है कि उसका सबसे बड़ा दुश्मन इज़राइल और अमेरिका है ऐसे में परमाणु हथियार अपने यहाँ बना कर वो ख़तरा नही लेता। ईरान के रूस,कोरिया,चीन, भरोसेमंद दोस्त है आउट सॉर्सिंग पे वो ईरान के लिए अपने देश में परमाणु तकनीक, संसाधन विकसित करके दे सकते हैं। और ध्यान भटकाने के लिए फ़र्ज़ी परमाणु रिएक्टर बना कर ग़ुमराह कर रहे हैं।
मसला यहाँ भी नही है।
ईरान-इज़राइल-अमेरिका की जंग ना सामारिक है ना साम्राज्यवादी। ना ये जंग ताक़त की है ना कब्ज़े की।
ये जंग धार्मिक है।
पहले संक्षिप्त विवरण समझते हैं उसके बाद समझाते हैं।
यहूदी इतिहास (Yahoodi History) की शुरुआत हजरत इब्राहीम (अ.) के खानदान से होती है, लेकिन मुख्य रूप से इसका विस्तार जनाबे इसहाक (Prophet Isaac) और उनके पुत्रों के माध्यम से हुआ।
यहाँ जनाबे इसहाक से लेकर यहूदी धर्म के गठन तक को समझते है उसके बाद आपको वजह बताते हैं इस जंग की।
जनाबे इसहाक़ , हजरत इब्राहीम और उनकी पत्नी सारा के पुत्र थे।
इस्लाम और यहूदी धर्म दोनों के अनुसार, वे अल्लाह के नबी थे।
इब्राहीम (अ.) के बाद, अल्लाह का अहद (वचन) उनके माध्यम से आगे बढ़ा।
जन्म: वे फिलिस्तीन (Canaan) में पैदा हुए।
पुत्र: उनके दो पुत्र हुए— ऐस (Esau) और याकूब (Jacob)। यहूदी इतिहास जनाबे याकूब से जुड़ा है।
2. जनाबे याकूब और 'इसराइल' का खिताब
जनाबे याकूब (Prophet Jacob) को अल्लाह की तरफ से 'इसराइल' (Israel) का खिताब मिला, जिसका अर्थ होता है "अल्लाह का बंदा"।
उनके 12 बेटे थे, जिनसे बनी कौम को 'बनी इसराइल' (इसराइल की संतान) कहा जाने लगा।
इन्हीं 12 बेटों में से एक जनाबे यूसुफ (Joseph) थे, जो मिस्र (Egypt) के वजीर बने। उनके समय में पूरा खानदान मिस्र जाकर बस गया।
कई सालों तक मिस्र में रहने के बाद, बनी इसराइल की हालत खराब हो गई और वहाँ के राजा (फिरौन) ने उन्हें गुलाम बना लिया।
फिर अल्लाह ने हजरत मूसा (Prophet Moses) को भेजा, जिन्होंने बनी इसराइल को फिरौन की गुलामी से आजाद कराया।
इसी दौरान उन्हें तौरात (Torah) किताब अता की गई और धर्म के नियम (Ten Commandments) मिले। यहीं से यहूदी धर्म एक संगठित धर्म के रूप में उभरा।
यहूदी' नाम कैसे पड़ा?
हजरत याकूब के 12 बेटों में से एक बेटे का नाम 'यहूदा' (Judah) था, जो हज़रत यूसुफ अस. के भाई थे बाद के दौर में जब बनी इसराइल का बँटवारा हुआ, तो एक बड़ा कबीला 'यहूदा' के नाम पर जाना गया।
धीरे-धीरे इस कौम के लोगों को 'यहूदी' कहा जाने लगा।
क्योंकि उनकी नस्ल यहूदा से बढ़ रही थी।
किंगडम ऑफ इसराइल (दाऊद और सुलेमान)
यहूदी इतिहास का सबसे सुनहरा दौर हजरत दाऊद (King David) और उनके पुत्र हजरत सुलेमान (King Solomon) का माना जाता है।
इन्होंने यरूशलेम (Jerusalem) को अपनी राजधानी बनाया।
हजरत सुलेमान ने 'हैकिले सुलेमानी' (The First Temple) तामीर करवाया, जो यहूदियों के लिए आज भी सबसे पवित्र स्थान माना जाता है। जहाँ जनाबे याक़ूब अस. के दौर का एक ताबूत था जिसे "ताबूत-ए-सकीना" कहते है। वो एक पवित्र संदूक थी और यहूदी का मानना था वो संदूक जब तक यहूदी के पास रहेगी यहूदी जंग जीतते रहेंगे। लेकिन जनाबे मूसा अस. के बाद वो संदूक ग़ायब होगयी, क्योंकि वो संदूक बस नबी अस. के पास रह सकती थी। यहूदी के पास ये संदूक (ताबूत ए सकीना) तभी आती जब नबी अस. की नस्ल यहूदी क़ौम में बाक़ी रहती।
अब यहाँ से थोड़ा इतिहास के पन्नों को पलटते हैं।
जनाबे इब्राहिम अस. की दो बीवी थी हज़रत सारा और हज़रत हाजरा।
जनाबे सारा से जनाबे इसहाक़ पैदा हुवे और जनाबे हाजरा से जनाबे इस्माइल अस.
अब तक 24 से 27 नबी अस. का सिलसिला जनाबे इसहाक़ की नस्ल में था लेकिन अब वो सिलसिला जनाबे इस्माइल अस. की नस्ल में आगया जिनके वंशज "हज़रत मोहम्मद स.अ" है।
तौरेत में साफ तौर पे लिखा था कि आख़िरी दौर में एक पैग़म्बर आएंगे जिनका सिलसिला जनाबे इस्माइल अस. से चलेगा।
बस यही एक चीज़ थी जो यहूदी की रातों की नींद हराम कर दी। वो हर कोशिश में लग गए कैसे मुसलमानों में नबी अस. का सिलसिला आने से रोका जाए।
आख़िरी पैग़म्बर अस.यहूदियों में आए, लेकिन जो अल्लाह ने मुक़र्रर कर दिया उसे कौन टाल सकता था।
यहूदी शुरू से हज़रत मोहम्मद स.अ साहब की पैदाईश तक हर कोशिश किए मारने की नही मार सकें
यहाँ तक कि उन्होंने हज़रत मोहम्मद साहब के चाचा अबू लहब को लालच देकर उनका दुश्मन बनाया और क़त्ल की साज़िश की लेकिन हर बार नाकाम रहे।
यहूदियों ने अबू सुफियान को हज़रत मोहम्मद स.अ के ख़ात्मे की ज़िम्मेदारी दी लेकिन वो और उसके कारिंदे हर जंग में हारे।
जंगे बद्र इस्लाम की पहली जंग जिसमे बस 313 मुसलमान थे और यहूदी कुफ़्फ़ार हज़ार।
जब हज़रत मोहम्मद स.अ से जंग होती हज़रत अली अस. उनके साथ होते और हर जंग में फ़तह मिलती।
अब यहूदी के दुश्मन हज़रत मोहम्मद अस. के साथ हज़रत अली अस. भी होगए।
हज़रत मोहम्मद स.अ की शहादत के बाद हज़रत अली अस. जानशीन बने।
हज़रत अली अस. को भी माहे रमज़ान की 19 तारीख़ को इब्ने मुलजिम नामक आतंकवादी ने अबू सुफियान के बेटे मुआविया के कहने पे नमाज़ की हालत में शहीद कर दिया।
फिर हज़रत अली अस. के बेटे हज़रत ईमाम हसन अस. को ज़हर देकर शहीद किया
और हज़रत ईमाम हुसैन अस. इब्ने अली अस. को यज़ीद बिन मुआविया बिन अबू सुफियान ने कर्बला में दस मुहर्रम को तीन दिन का भूखा प्यासा उनके बहत्तर साथियों के साथ शहीद करवा दिया। जिसमें छह माह का बच्चा शहज़ादे अली असग़र भी थे।
हज़रत मेहदी का ज़हूर और दज्जाल का आना।
हज़रत अली अस. के बारहवे वंशज हज़रत मेहदी अस. जो अल्लाह के हुक़्म से लोगों की आंखों से ग़ायब होगए।
बारह सौ साल से भी ज़्यादा हो चुका है अब तक।
हज़रत मोहम्मद अस. ने पहले ही हज़रत मेहदी अस. के आने की भविष्यवाणी कर दी थी और उनके आने से पहले होने वाले घटनाक्रम की।
हज़रत अली अस. के ही 37वें वंशज हज़रत अली ख़ामेनई है।
जामकरन मस्जिद को माना जाता है ये हज़रत मेहदी अस. का स्थान है और वो यहाँ आते हैं।
यहूदी दज्जाल के ज़हूर की दुआ कर रहे हैं और मुसलमान हज़रत मेहदी अस. की।
दज्जाल तभी आएगा जब हज़रत मेहदी अस. आएंगे और ये तब होगा जब दुनिया में ज़ुल्म बहुत ज़्यादा बढ़ जाएगा। बच्चों का क़त्ले आम होगा, लोगों में ज़ुल्म होगा, मासूमों का क़त्ल होगा।
जो जो भविष्यवाणी हज़रत मोहम्मद स.अ ने की थी उसके पूरा होने के बाद ही हज़रत मेहदी आएंगे। हज़रत मेहदी मुसलमानों के मसीहा है और यहूदी का मानना है कि दज्जाल उनका मसीहा होगा, यही ताबूत ए सकीना लेकर आएगा। दज्जाल के आने से यहूदियों को उनकी खोई हुई सल्तनत मिल जाएगी और उस बद दुआ से आज़ाद हो जाएंगे जिसकी वजह से उनकी नस्ल से पैग़म्बर ख़त्म हो गए। और यहूदी को ज़िल्लत ओ रुसवाई की क़ौम बना दिया। अल्लाह ने यहूदी को बद दुआ दी है कि ये हमेशा ज़लील ओ रुसवा होते रहेंगे।
बस हज़रत ख़ामेनई और ईरान को ख़त्म करने के लिए अमेरिका इज़राइल इसलिए लगे है कि इससे इमाम मेहदी के आगे का रास्ता आसान होगा और फिर दज्जाल भी आएगा।
दज्जाल के आने से यहूदी की पूरी दुनिया में हुक़ूमत हो जाएगी।
यहूदी ईरान और ख़ामेनई साहब से नही हज़रत मोहम्मद अस. के वंशज से लड़ना चाहते हैं।
जब ईमाम मेहदी अस. आएंगे उनके साथ जनाबे ईसा इब्ने मरीयम अस. भी आएंगे और 313 लोग। जो इस्लाम की पहली जंग ए बद्र में 313 लोग थे वही 313 की तादात हज़रत मेहदी अस. के साथ भी रहेगी।
ये जंग और ताक़त से ज़्यादा धार्मिकहो चुकी है। इतिहास के पन्ने में झांके और क़ुरआन पढ़े तो आपको इस जंग की सारी हक़ीक़त सामने आजाएगी।
अब तक यहूदी मुसलमानों के हाथों हर जंग में शिकस्त खाएं है और अब वो हज़रत मोहम्मद अस. के वंशज को ख़त्म करके अपने असहाब अपने बुज़ुर्गों की हार का बदला लेना चाहते हैं।
बाक़ी, तेल का खेल,परमाणु ये सब एक बहाना है।
Good Concept and writing keep it up from Sana
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