हम (ईरान) दुश्मन को घुटनों पर ले आएंगे।। शहीद अयातुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई
शहीद अयातुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई।
चालीस दिन बाद, फ़तह ख़ैबर के बाद एक बार फिर हैदर ए कर्रार के मानने वालों ने इस ख़ैबर को भी फतह कर ही लिया और दर ए ख़ैबर की तरह इस दर (साम्रज्यवाद) को उखाड़ फेंका।
ग़ैबी इम्दाद उन्ही को हासिल है जो ग़ैब पे ईमान रखते हैं।
आज दुश्मन घुटनों पे आगया, एक बार फिर अयातुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई का कहना सच होगया।
उन्होंने कहा था, हम दुश्मन को घुटनों पे ले आएंगे, हमसे (ईरान) जंग में दुश्मन ज़लील ओ रुस्वा होगा इंशाअल्लाह। वो अपने हथियार परभरोसा रखते हैं और हम अपने ख़ुदा पर। आप अपनी आँखों से उन्हें ज़लील होता हुआ देखेंगे।
एक बार फिर से इस्लाम ख़ुद को दोहरा रहा है।
ईमाम हसन ए मुज्तबा की सुलह, और अब अयातुल्लाह अली मुज्तबा की सुलह।
ऐसा लग रहा है आधुनिक युग की कर्बला हमारे सामने हो रही हो।
वही हालात, वही जज़्बात, वही शहादत का जज़्बा और फिर फ़तह।
ईमाम हुसैन अस. की शहादत के बाद दुनिया ने ईमाम हुसैन इब्ने अली अस. को पहचाना था, यहाँ भी अयातुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई र.अ की शहादत के बाद दुनिया ने उन्हें पहचाना।
यज़ीद ने भी सोचा था ईमाम हुसैन अस. को क़त्ल करने से हुसैन इब्ने अली अस. का वजूद ख़त्म हो जाएगा, इस दुश्मन ने भी सोचा अली ख़ामेनेई को क़त्ल करके सब ख़त्म होजाएगा।
आज फिर मौलाना मोहम्मद अली जौहर साहब का ये शेर चरितार्थ होगया।
"क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यज़ीद है,इस्लाम ज़िंदा होता है हर कर्बला के बाद"
अर्थ: हुसैन का कत्ल वास्तव में यजीद (बुराई) की मौत है, इस्लाम हर कर्बला (त्याग) के बाद पुनर्जीवित होता है।
दर्स ए कर्बला क्या है ? (कर्बला की शिक्षा)
ये आज पूरी दुनिया ने देख लिया।
ईमाम हुसैन इब्ने अली अस. ने फ़रमाया था।
दुश्मन के मुक़ाबले जितनी देर से उठोगे उतना नुक़सान उठाओगे।
यज़ीद से बैय्यत (आत्म समर्पण/अधिकार हस्तांतरण)
के सवाल पे ईमाम हुसैन इब्ने अली अस. के कहा था।
"मुझ जैसे कभी तुझ जैसे कि बैय्यत नही करेगा"
"ज़िल्लत की ज़िन्दगी से इज़्ज़त की मौत बेहतर है"
"मुझे शहादत क़ुबूल है झुकना नही"
"हमारा मक़सद इस्लाम बचाना है चाहे सब क़ुर्बान होजाए"
अयातुल्लाह सैय्यद अली ख़ामेनेई साहब ने भी फ़रमाया था।
"हमे ईरान नही, इस्लाम बचाना है"
दुश्मन इस्लाम की असल सूरत बदलना चाहते हैं, और हम उन्हें कभी क़ामयाब नही होने देंगे चाहे हमे कितनी भी शहादत क्यों ना देनी पड़े।
ईमाम हुसैन अस. ने भी फ़रमाया था हमारा मक़सद इस्लाम बचाना है, दुश्मन इस्लाम की असल सूरत बिगाड़ना चाहते हैं, वो ख़ुदा के दीन में तब्दीलियां करना चाहते हैं।
ख़ुदा और मेरे नाना स.अ का दीन बचना चाहिए ,चाहे मेरा सब कुछ क़ुर्बान होजाए।
आज इतिहास अपने आपको लफ़्ज़ बा लफ्ज़ दोहरा रहा है।
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