जब मज़दूर ने मालिक़ से पूछा आपको कितने पैसे चाहिए मैं देता हूँ
हल जज़ाउल एहसान इल्ल एहसान
नेकी का बदला भला नेकी के सिवा कुछ है (सूरह रहमान)
कभी कभी रिश्ते बनते नही है ख़ुद बा ख़ुद बन जाते हैं । इंसानियत के रिश्ते से बड़ा दुनिया में कोई रिश्ता नही होता है ।
ना कोई हिन्दू होता है ना कोई मुसलमान होता है
वक़्त पर जो काम आए वही बस इंसान होता है ।
ये कहानी नही एक सच्चाई है जो मैं आज आप लोगो को बताने जा रहा हूँ । इस कहानी है कि शुरुआत होती है लॉक डाउन से । मई में कोरोना और लोगों की मजबूरी चरम पर थी हर शख़्स मई में दो जून की रोटी को हैरान ओ परेशान था मार्च से लगे लॉक डाउन ने मई तक लोगो की क़मर ख़मीदा और हाल बोशीदा कर दी जो हालात पोशीदा दे वो मंज़र ए आम पर आगए । चारो तरफ अजीब सी खामोशी खाने की परेशानी और सुनाने को अपनी दुखभरी कहानी इसके सिवा कुछ नही बचा था । जो जहाँ था उसी जगह ठहर गया मानो वक़्त ने अपने आग़ोश में सभी को समेट लिया हो । रोज़ी रोटी और पैसा कमाने की चाह इंसान को उसके गाँव, शहर, वतन ले आयी थी इसी में आया था मेरे घर करंजाकला गाँव का जितेन्द्र नाम का एक मज़दूर । कहने को तो मज़दूर था पर दिल का राजा था । लॉक डाउन की फ़ुर्सत में घर पर कुछ छोटा मोटा काम करवा रहे थे एक मज़दूर मिला बोला साहब कोई काम दे दो मुझे मज़दूर की ज़रूरत थी और उसे मज़दूरी की मज़दूर की मजबूरी उसे यहाँ ले आयी थी । उससे मैंने कहाँ मुझे साहब मत कहो छोटे भाई जैसा हूँ आप मेरे बड़े भाई जैसे हो ज़रूरी नही आपके पास पैसा हो तभी आप दिल में बसों वो कहते है ना
नहरों से पानी हटाया नही जाता
किसी का क़द घटाया नही जाता
बनने वाले ख़ुद ही बन जाते है अपने
किसी को अपना कह कर बनाया नही जाता ।
इसी बात को चरितार्थ करते हुवे जितेन्द्र भाई मेरे यहाँ काम करने लगे मैं बहुत पैसे वाला तो था नही फिर भी कुछ पैसे की मज़दूरी बढ़ा कर दे दिया करता था घर से खाना दे दिया करता था बात करते करते उसके साथ रोड तक जाता इसी तरह 20 दिनों तक उसने काम किया फिर काम ख़त्म होगया तो मुझसे बोला आदिल कोई काम होगा तो बताना मैं गुजरात में अपना फ़ास्ट फ़ूड का होटल चलाता था लॉक डाउन की वजह से धंधा बन्द होगया है मज़दूरी करनी हो या कैटरिंग का काम हो कोई भी काम होगा हम कर लेंगे मैंने हामी भरी उसको अपना नंबर दिया और वो चला गया । उसके काम के लिए मैंने कई जगह बात की एक जगह काम मिला पर उसका नंबर नही मिला मैं परेशान था । 20 दिन काम किया था पर मेरा काम पैसा मेरे पास ख़त्म होने की वजह से अधूरा पड़ा था मेरी भी नौकरी जा चुकी थी बची खुची सेविंग घर के काम मे लगा दी लम्बे दौर की कोरोना से लड़ाई लड़नी थी इसीलिए काम अधूरा ही छोड़ दिया था । कल मेरे पास जितेन्द्र भाई का फ़ोन आया रात के 10:00 बजे अमूमन मैं 9:00 बजे के बाद फ़ोन नही उठाता 10:00-11:00 तक सो जाता हूँ उस दिन जितेन्द्र की कॉल आयी बात होने लगी सबसे पहले तो उसने बताया कि उसका धंधा फिर से शुरू होगया है फिर कहाँ आदिल भाई आपके घर का काम पूरा हुआ या नही मैंने कहा अभी अधूरा है । उस शख़्स ने कहा अरे आदिल भाई आप काम लगवाये लाख -पचास हज़ार हम देते हैं जो भी ज़रूरत हो बता दो भाई जितना पैसा चाहिए या कपड़ा, मिठाई फोन कुछ भी चाहिए बताओ भाई हम भेज देते हैं आप अपना अककॉउंट नंबर दो मुझे हम अभी पैसा भेज देते हैं । आपने उस वक़्त मेरी मदद की जब हर तरफ़ से उम्मीद ख़त्म होरही थी । मैंने उसकी मदद चंद रुपयों से की थी वो मदद नही लेना चाहता था तो इसीलिए मैंने पैसे बढ़ा के दिए ताकि उसे एहसास ना हो आज उसने मुझे अपनी बातों से ख़रीद लिया । सोचने पर मजबूर कर दिया बड़ा वो है या हम है । इंसानियत से बड़ा कोई रिश्ता नही होता ये जितेन्द्र भाई ने साबित कर दिया इतने दिनों बाद भी उसे मेरा हाल चाल और मेरे हालात जानने की बेचैनी थी उसको लगता था मेरा पैसा उसपर उधार है इस एहसान को चुकाने का इससे अच्छा रास्ता नही है । पैसे के साथ साथ उसने मुझे गुजरात आने का न्यौता दिया बोला आओ तुम्हे सूरत में ही अच्छी नौकरी दिलवाता हूँ मेरे घर पर रहना भाई जितने दिन मन होगा यहाँ रहना खाना पीना और जब भी किसी चीज़ की ज़रूरत होगी बता देना हम भेज देंगे । तुमने मुझे बड़ा भाई कहा था उसदिन से तुम मेरे दिल में बस गए हो एक मज़दूर को कौन इतनी इज़्ज़त देता है सब तो गालियाँ देते हैं पैसा भी नही देते तुमने मुझे इतनी इज़्ज़त दी जिसका एहसान मैं नही चुका सकता । मेरी जब ज़रूरत होगी जहाँ ज़रूरत होगी बता देना तुम्हारा ये बड़ा भाई हमेशा हाज़िर रहेगा तुम्हारे लिए ।
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