अफ़सोस की सोशल मीडिया के धुरंधर बिना बातों को समझे चेपने लगते हैं, एक एडवाजरी ही तो है
सोशल मीडिया कॉलेज की रफ कॉपी है कुछ भी लिखते रहो क्या फ़र्क़ पड़ता है जाना रद्दी में ही है। अब हमारी क़ौम के लोगों को ही देख लो जिस बात को प्यार से समझाया जा सकता है उस बात के लिए तक़रार पैदा कर रहे हैं। इस्लाम धर्म में तर्क के साथ बात की गई है। क़ुरआन अगर पढ़ा है तो देखे किस तरह उसमे तर्क दिया गया है नहजुल बलाग़ा पढ़े किस तरह हर चीज़ को तर्क के साथ समझाया गया है। पर अफसोस ही हमारी क़ौम ने जज़्बात को अपनाया जा नमाज़ को नही । एक एडवाजरी आयी उसपर हो हल्ला मच गया कॉपी पेस्ट वालों ने बिना सोचे समझे चेपना शुरू कर दिया अबे पहले समझ तो लेते उसमे क्या लिखा है और उस बात का जवाब कैसे देना है। हर बात कहने का समझाने का अपना तरीक़ा होता है। पहली बात की आज तक आप ये नही समझा पाएं की मुहर्रम क्या है क्यों मनाया जाता है और इससे सामाजिक और आर्थिक क्या फ़ायदा है। दूसरी चीज़ हम शिया सुन्नी पर लड़ते रहे पर इसपर कभी ध्यान नही दिया इसका आगे अंजाम क्या होगा ना आपके लड़ने से क़ुरआन बदल सकता है ना इस्लाम बदल सकता है। जो बातें लोहे महफ़ूज़ में है उसे आप बदल नही सकते ना किसी के ईमान और आमाल को आप बदल सकते हैं। जो बातें है नही उसे आप ख़ुद मौक़ा दे रहे हैं। आपकी तरफ़ गेंद उछाली गयी और आप लपक कर कैच कर लिए आपका प्रतिक्रिया देने का अर्थ है ऐसा होता है। सोशल मीडिया पर गंद फैलाने से अच्छा था बात को पहले समझते ड्राफ्ट को समझते उसके पहलू को समझते।
मुहर्रम क्या है पहले तो ये जान ले। मुहर्रम हिजरी कैलेण्डर का पहला महीना है। मुहर्रम में हज़रत मोहम्मद साहब के नवासे हज़रत ईमाम हुसैन और उनके बहत्तर साथियों को कर्बला के मैदान में तीन दिन का भूखा प्यासा शहीद कर दिया गया और उनके घर की औरतों और बच्चों को क़ैदी बना लिया गया। किस जुर्म में इमाम हुसैन को शहीद किया गया ?
इमाम हुसैन मोहम्मद (स) साहब के नवासे और हज़रत अली के कनिष्ठ पुत्र है यज़ीद मुअविया का बेटा है मुअविया से अतीत में हज़रत अली और उनके ज्येष्ठ पुत्र इमाम हसन की तक़रार हो चुकी थी। मुअविया के मरने के बाद यज़ीद गद्दी पर बैठा इधर इमाम अली और इमाम हसन की शहादत के बाद इमाम हुसैन अपने अनुयायियों के नेतृत्वकर्ता और रहनुमा बने। चूँकि हज़रत इमाम हुसैन मोहम्मद साहब के नवासे और इमाम अली के पुत्र थे जिनके अनुयायी पूरी दुनिया में थे यज़ीद जब गद्दी पर बैठा तो सभी से सहमति/बैयत करवाने लगा मिस्र से लेकर यमन तक ईरान से लेकर ओमान तक जितने हुक्मरां थे सबने यज़ीद की बैयत या तो दीनार ओ दिरहम की लालच में करली या फिर जंग के खौफ़ से क्योंकि यज़ीद का लश्कर बहुत विशाल था लगभग दस लाख का लश्कर था। सभी की बैयत कर ली पर जिस घर से इस्लाम का आरम्भ हुआ जो जिससे इस्लाम को पहचान मिली उस घराने की बैयत ना होने से सभी मे सुगबुगाहट होने लगी अगर यज़ीद सच में इस्लामिक जगत का ख़लीफ़ा है तो फिर मोहम्मद के घराने ने बैयत क्यों नही की अली के पुत्र इमाम हुसैन ने बैयत क्यों नही की। यज़ीद को अंदेशा होगया अगर इमाम हुसैन की बैयत नही ली तो ये लोग बग़ावत कर देंगे और हमारा साम्राज्य तबाह होजाएगा हुसैन की बैयत किसी भी हाल में लेने के लिए यज़ीद ने कई योजना बना डाली और षड्यंत्र के तहत इमाम हुसैन को कर्बला बुलाया बैयत लेने को जब इमाम हुसैन मदीने से कर्बला पहुँच गए तो यज़ीद ने कहा या तो बैयत करो या जान दो। इमाम हुसैन का बैयत करने का मतलब था मोहम्मद साहब के दीन में तब्दीली और उसे बर्बाद करना इस्लाम तबाह होजाता सब तहस नहस होजाता इसीलिए इमाम हुसैन ने शहादत देना क़ुबूल किया क्योंकि वो जानते थे अगर शहादत दे देंगे तो लोग ख़ुद देख लेंगे की अपने आपको इस्लामिक जगत का ख़लीफ़ा कहने वाला मोहम्मद साहब के घराने से बैयत नही ले सका जिसका सीधा अर्थ था यज़ीद ज़ुल्म और ज़ोर ज़बरदस्ती से सभी को अपनी तरफ कर रहा है। इस तरह इमाम हुसैन को इस्लामिक कैलेण्डर की सन 61 हिजरी 681 ईसवी में 10 मुहर्रम के दिन तीन दिन का भूखा प्यासा पूरे परिवार के साथ शहीद कर दिया और जो ज़िन्दा बचे जिसमे औरतें और बच्चें भी थे उन्हें क़ैदी बना कर क़ैद ख़ाने में डाल दिया और एक साल तक उनपर अत्याचार करता रहा जिनकी याद में शिया समुदाय मुहर्रम मनाते है और इमाम हुसैन की शहादत को याद करके रोते हैं उनके सफ़र के प्रतीक अलम, ज़ुल्जना तथा तुर्बत ताबूत के जुलूस को निकाल कर शोक मानते हैं।
मुहर्रम का सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण।
यूं तो मुहर्रम शोक का महीना है पर अगर इसे सामाजिक दृष्टिकोण से देखे तो हमे कठिन परिस्थितियों में भी जीने की प्रेणना मिलती है कितना भी ज़ुल्म हो पर ज़ालिम के सामने नही हारना है। ग़लत बात का विरोध करना है और ग़रीब मज़लूम का साथ देना है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो मुहर्रम में बच्चे से लेकर बूढ़े तक इमाम हुसैन की शहादत को याद करके रोते हैं इस रोने से कई सारे हार्मोन्स निकलते हैं जिससे हृदय सख़्त नही होता और लोग संगदिल नही होता। यही वजह है कि आज तक दुनिया में एक भी शिया आतंकवादी आपको नही मिलेंगे क्योंकि बार बार रोने से उनके दिलों में समाज और लोगों के प्रति हमदर्दी पैदा होजाती है वो इमाम हुसैन की जगह ख़ुद को तसब्बुर करते है और ये सोचते हैं कि अगर उनके परिवार पर दोस्तों पर ये मुसीबत आती तो वो क्या करते जिस वजह से समाज के वो हर वर्ग से प्यार करते हैं और सभी को अपना समझते हैं उनके लिए ऊंच नीच ज़ात पात का भेद मिट जाता है सभी को अपना दोस्त समझते हैं और नर्मी से पेश आते हैं क्योंकि उनका हृदय रोने से कोमल होजाता है वो सख़्त दिल के नही होते ना किसी पर जुल्म ओ अत्याचार करते हैं।
आर्थिक दृष्टि से मुहर्रम के फ़ायदे
भारत में तक़रीबन 4-5 करोड़ शिया हैं मुहर्रम दो महीना आठ दिन शोक मनाया जाता है प्रत्येक व्यक्ति मुहर्रम के 12 दिन कम से कम सौ रुपए तबर्रुक पर ख़र्च करता है ये तबर्रुक कहीं विदेश से नही बल्कि छोटी छोटी दुकानों से लिया जाता है एक दिन में क़रीब पाँच साथ सौ करोड़ रुपए पूरे देश में ख़र्च होता है जिसका और बारह दिन में क़रीब हज़ारो करोड़ रुपए तबर्रुक पर ख़र्च होता है जिसका सीधा फ़ायदा देश के आर्थिक विकास को गति देने में मिलता है साथ ही विभिन्न प्रकार के नौकरी कब अवसर खुलते हैं कांठशिल्पी की पूरे साल की कमाई मुहर्रम में ताज़िया बनाने से होजाती है एक ताज़िए की क़ीमत दो हज़ार से पचास हज़ार तक पड़ती है। मुहर्रम में कागज़, बांस, स्नैक्स, बेकरी, खाद्यान, उधोगों की मांग बढ़ जाती है हज़ारो करोड़ रुपये सीधे तौर पर इन उधोगों को मुहर्रम माह में प्राप्त होता है, प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से लाखों लोगों को रोज़गार प्राप्त होता है। देश के आर्थिक विकास में मुहर्रम का बहुत बड़ा योगदान है जिसका फ़ायदा देश को सीधे तौर पर मिलता है।
मुहर्रम सिर्फ एक समुदाय के लिए नही बल्कि समाज और देश हित के लिए मनाया जाता है और इसमें किसी तरह का कोई विवाद नही होता अतीत में शिया सुन्नी विवाद होता था पर अब शिया सुन्नी मिलकर ये शोक मनाते है जिससे अब किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न नही होता अगर कहीं कुछ हल्का फुल्का विवाद होता भी है तो वो किसी अन्य कारण से होता है। धार्मिक भावनाओं को आहत करने का हमारा कोई इरादा नही है हम बस शांतिपूर्ण तरीके से मुहर्रम मनाने की इजाज़त चाहते हैं और हमारी कोशिश रहती है सभी वर्ग को साथ लेकर चले तथा इंसानियत का पैग़ाम दे। मुहर्रम भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम देता है मुहर्रम का मक़सद ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना और मज़लूम का साथ देना है। मुहर्रम अत्याचार और आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक आंदोलन है।
Very good reporting
ReplyDeleteAijaz sir
It's a true story of Mohrram
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