बे अमल ना मुक़म्मल मौलवी बांट देंगे किसी को भी जन्नत। क्योंकि ये है मौलवी की जन्नत
एक बार एक मौलवी साहब सफ़र से वापस आएं , पता चला की घर में कुछ खाने को नही है सफ़र की थकन और कई दिनों से नहा नही पाने से पसीने से तरबतर मौलवी साहब को किसी ने बताया कि बगल में हाजी साहब के यहाँ लल्लनटॉप दावत चल रही है। मौलवी साहब एकदम चपूवा भूखे थे सोचा पहले शिकम सेर हो ले फिर नाहा धो कर ढेर हो ले। मौलवी साहब के बदन से बदबू बहुत ज़्यादा आरही थी। मौलवी साहब जैसे दावत में पहुँचे सब इस्तक़बाल में खड़े होगए पर जैसे ही मुसाफ़े के लिए आते नाक भौं सिकुड़ने लगते। मौलवी साहब को अंदाज़ा होगया की बदन दफ़्न करने लायक़ है बेहतर है जल्दी खा पी के यहाँ से चिराओं ले लिया जाए। मौलवी साहब ने हाजी साहब को बुलाया और फ़रमाया मेरे बदन से बहिश्त की खुशबू आती है पर इसे सिर्फ़ ईमान वाला मुत्तक़ी परहेज़गार मोमीन ही सूंघ सकता है जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखता है,काफ़िर, मुशरिक, मुनाफ़िक़, मुनकिर को ये खुश्बू कभी नही सुंघाई देगी क्या आपको कुछ खुशबू महसूस होरही है ? हाजी साहब ने सोचा अगर कहेंगे कि खुशबू नही बदबू आरही है तो ईमान पर सवाल उठेगा, हाजी साहब ने कहा माशाअल्लाह, सुभानअल्लाह मैं सदके जाऊं, क़ुर्बान होजाऊँ आप पर ये तो बेशक बहिश्त की ही खुशबू है। अब क्या था धीरे धीरे ये बात फैल गयी कि मौलवी साहब के बदन से बहिश्त की खुशबू आरही है। कोई कहता ये तो कस्तूरी की खुशबू है कोई कहता ग़ुलाब की है कोई कुछ जो नाक भौं बना कर मौलवी साहब से भाग रहे थे वही आकर बदन का बोसा लेने लगे। अब भला कोई कैसे कहे कि मौलवी साहब के बदन से बदबू आरही है। लोग मौलवी साहब की ख़िदमत में लग गएं एक से एक खाना आगे पीछे ख़िदमत करने वालों का हुजूम। मौलवी साहब मन ही मन मुस्कुराए वाह बेटा जुम्मन आज तो कमाल कर दिया अब पूरे साल ना भी नहाएं तो कोई पूछने नही आएगा।
अब कौन जारहा है देखने की बहिश्त की खुशबू कैसी है उसकी तस्दीक़ कौन करेगा।
किसी भी चीज़ को अक़्ली मेयार पर परख ले हदीसे सिर्फ़ आपकी दलीलों को पुख्ता करने के लिए है पर उसके लिए भी अक़्ली मेयार ज़रूरी है। ज़रूरी नही सामने वाला आलिम हो तो वो सही कहता हो पहले अपनी अक़्ल से सोच लो कि क्या ये सही होसकता है या ग़लत होसकता है।
इमाम मूसा क़ाज़िम अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं हम अहलेबैत अलैहिस्सलाम बिना अल्लाह की इजाज़त के कोई क़लाम नही करते हैं पस तुम जिस हदीस को या क़ौल को सुनो पढ़ो तो उसे क़ुरआन से मिला लो अगर क़ुरआन में वो अल्फ़ाज़ महफ़ूज़ है तो वो हदीस हमसे होगी वरना उसे कहने वाले के मुँह पर मार दो चाहे वो कितना बड़ा आलिम क्यों ना हो।
बस यही हाल हमारा है किसी मुल्ला मौलवी मौलाना ने कोई जुमला उझाल दिया तो हम बिना तस्दीक़ उसको सही/ ग़लत ठहराने लगते हैं। मौला अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा में फ़रमाते हैं।
जब कोई हदीस सुनो तो उसे अक़्ल के मेयार पर परख लो,सिर्फ़ नक़्ल ए अल्फ़ाज़ पर बस ना करो, क्योंकि इल्म को नक़्ल करने वाले तो बहुत हैं पर उसमें ग़ौर ओ फ़िक़्र करने वाले कम हैं।
(अक़वाल नं. 98 नहजुल बलाग़ा)
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