जाने पूर्व में किस गलतफहमी से होता रहा है शिया सुन्नी विवाद मुहर्रम में और किस बात पर जारी हुई एडवाइजरी

उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक डीजीपी सर द्वारा एक पत्र जारी किया गया है उस पत्र में मुहर्रम के मद्देनज़र पुलिस अधीक्षकों को दिशा निर्देश दिया गया है। उपयुक्त पत्र में मुहर्रम के संबंध में बहुत सारी बातें कही गयी है जिसमे मुहर्रम को अतिसंवेदनशील बताया गया है तथा ये भी कहा गया है इससे शिया सुन्नी विवाद उत्पन्न होसकता हैं। डीजीपी साहब का कहना है कि शिया समुदाय सुन्नी मुसलमानों के ख़लीफ़ाओं के ख़िलाफ़ तबर्रा (व्यक्तिगत लक्षणीय टिप्पणी) करते हैं। 

तबर्रा के संबंध में कुछ बातें स्पष्ट करना चाहते हैं। पहली बात ये है कि इस्लाम में हज़रत मोहम्मद साहब के बाद जो उनके धार्मिक कार्यो को आगे बढ़ाए है तथा उनके दिशा निर्देशों का पालन किया वो ख़लीफ़ा कहलाएं। हज़रत मोहम्मद साहब की मृत्यु के बाद मुसलमानों के चार ख़लीफ़ा हुवे हज़रत उमर, हज़रत,अबू बक्र, हज़रत उस्मान और हज़रत अली। हज़रत अली मोहम्मद साहब के दामाद थे उनकी एकलौती बेटी शहज़ादी फ़ातिमा ज़हरा (स.अ) के पति थे इन्हें शिया समुदाय अपना पहला इमाम (नेतृत्वकर्ता/ रहनुमा) मानता है। हज़रत अली ने हज़रत मोहम्मद (स) के साथ बहुत सारी जंगे की है। हज़रत अली के ही कनिष्ठ पुत्र हज़रत इमाम हुसैन है जिनकी शहादत दिवस एवं शोक में मुसलमान मुहर्रम मनाता है। ख़लीफ़ा चार थे और सहाबा (साथी) बहुत सारे थे जिसमे कुछ ख़ास सहाबा का इतिहास में वर्णन मिलता है जिसमे हज़रत अली, हज़रत उमर, हज़रत,अबूबक्र, हज़रत उस्मान, हज़रत सलमान, हज़रत जाबिर, और भी सहाबा का उल्लेख मिलता है पर ये सहाबा इस्लामिक इतिहास में उल्लेखनीय है। जहाँ तक मसला तबर्रा का है तो कुछ ना समझी और कुछ गलतफहमी से लोगों को भ्रम होगया की शिया समुदाय ख़लीफ़ाओं पर तबर्रा करते हैं। दअरसल इमाम हुसैन की जंग यज़ीद से हुई थी यज़ीद सीरिया का बादशाह था यज़ीद के पिता मुअविया थे। मजलिसों में जब इमाम हुसैन की शहादत का वर्णन किया जाता है तो इमाम हुसैन पर हुवे ज़ुल्म और अत्याचार को भी बताया जाता है जिसमे यज़ीद का नाम आता है तथा यज़ीद इब्ने मुअविया कहा जाता है मुअविया को कुछ लोग सहाबा कहते हैं और कुछ लोग यज़ीद को भी सहाबा मानते है। मुअविया ने कई मौक़ो पर हज़रत अली से जंग की है उनके ज्येष्ठ पुत्र हज़रत हसन को भी धोखे से मरवाया तथा और भी पडयंत्र का उल्लेख इस्लामिक इतिहास की किताबों में मिलता है। बस इसी बात को लोगों ने तबर्रा समझ लिया। क्या ऐसा मुमक़िन है कि जिसने क़त्ल किया हो मोहम्मद के घराने पर जुल्म ढाया हो वो सहाबा हो सकता है ? यज़ीद इब्ने मुअविया (यज़ीद पुत्र मुअविया) कहने को कुछ लोग तबर्रा समझ रहे हैं जबकि इसमे तबर्रा जैसा कुछ नही है। आप पर अगर कोई अत्याचार करे तो आप उसका और उसके माता पिता का नाम लेंगे संविधानिक तौर पर भी किसी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की जाती है तो उसके पिता के नाम के साथ ही उसका ज़िक्र होता है। 
दूसरी वजह तबर्रा समझने की ये है की कर्बला की जंग में इमाम हुसैन को शहीद करने में यज़ीद की फौज के सेनापति उमर इब्ने साद का बहुत बड़ा हाथ था उमरे साद भी कभी सहाबा था पर यज़ीद द्वारा दिये गए प्रलोभन से वो यज़ीद के साथ होगया और इमाम हुसैन की शहादत में अहम भूमिका निभाई। उमर इब्ने खत्ताब जो कि मुसलमानों के ख़लीफ़ा और रसूल के सहाबा है और उमर इब्ने साद इमाम यज़ीदी फ़ौज का सेनापति है । उमर इब्ने साद और उमर इब्ने खत्ताब एक मे नाम ए उमर एक जैसे होने की वजह से लोगों ने समझ लिया कि मुसलमानों के ख़लीफ़ा को शिया समुदाय तबर्रा करते हैं जबकि हक़ीक़त ये है कि यज़ीदी फौज के सेनापति उमर इब्ने साद को शिया समुदाय कहते है जिसका इतिहासिक किताबों में वर्णन मिलता है। बस इसी बात को मुद्दा बना कर शिया समुदाय को बदनाम किया जा रहा है जबकि शिया समुदाय के सबसे बड़े धार्मिक गुरु अयातुल्लाह ख़ामेनई और अयातुल्लाह सिस्तानी ने शिया सुन्नी को अलग अलग नही एक ही बताया। सुन्नी सिर्फ़ आपके भाई नही नफ़्सो जान है। शिया सुन्नी इस्लाम के दो बाज़ू हैं। ग़ैर मुस्लिम को हरगिज़ चोट ना पहुंचाओ चाहे वो किसी भी धर्म या फ़िरके क्व हो। गौरतलब है कि प्रत्येक शिया अयातुल्लाह ख़ामेनई या अयातुल्लाह सिस्तानी का अनुशरण (तक़लीद) करता है और उनके सभी उपदेशों पर अमल करता है । शिया समुदाय में तक़लीद का बहुत बड़ा महत्व है भला ये क्योंकर होसकता है कि शिया समुदाय अपने धार्मिक गुरु की बात को ना माने और शिया सुन्नी विवाद को जन्म दे। अब अगर किसी पार्टी की रैली होरही हो और उस पार्टी के विपरीत कोई भी घुस कर उसमें कोई ऐसा नारा लगा दे जो देशहित में ना हो तो क्या उसमे उस पार्टी की ग़लती है ? अभी हाल ही मे पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगाते हुवे कुछ लोग पकड़े गए थे रैली किसी पार्टी की थी और नारा किसी दूसरी पार्टी का कार्यकर्ता लगा गया जैसा कि समाचारों स ज्ञात हुआ था। उसी तरह मुहर्रम भी है जिसे मुसलमानों का सभी वर्ग मनाता है।

दूसरी बात उस पत्र में ये है कि इसमें यौन उत्पीड़न तथा गौ हत्या जैसे कार्यो का पूर्व में हुई घटना का ज़िक्र  है। ताज़िया निकालने को लेकर विवाद हुआ है।

 दरअसल मुहर्रम एक सामाजिक शोक सभा है जिसमे सभी धर्म सभी वर्ग के लोग शामिल होते हैं उसमें केवल शिया समुदाय नही होता जुलूस क्योंकि सार्वजनिक स्थानों पर होता है तो उसमें सभी धर्म के लोग आजाते हैं भीड़ में कोई भी असामाजिक तत्व कोई कार्य करदे तो उसका दोष शिया समुदाय को देना उचित नही है। भीड़ में किसी ने भी किसी को छेड़ दिया होगा या यौनाचार कर दिया होगा तो उसका दोष एक समुदाय पर या मुहर्रम पर नही लगाया जा सकता है ऐसे तो सभी धर्मों के सामाजिक धार्मिक कार्यक्रमों में कुछ ना कुछ ऐसा होजाता है अब कोई सामाजिक तत्व ऐसा कर दे तो कहा तक उसे रोका जा सकता है।

ताज़िया विवाद की जहाँ तक बात है तो मुहर्रम पूरी दुनिया में मनाया जाता है भारत के हर गाँव शहर में मुहर्रम मनाया जाता है जिसे शिया समुदाय दो माह आठ दिन तक मनाते है जबकि मुसलमान केवल दस मुहर्रम को जिसे आशूरा भी कहते है जिस दिन इमाम हुसैन की शहादत हुई उसी दिन मनाते हैं। शिया समुदाय परम्परागत ,सुसंगत तरीक़े से धार्मिक मान्यताओं तथा अनुष्ठानों के तहत मुहर्रम की शोक सभा करता है जबकि। शिया समुदाय के साथ साथ सुन्नी समुदाय का भी विभिन्न वर्ग मुहर्रम मनाता है पर जिस तरह परम्परागत तरीक़े से शिया समुदाय मनाता है उस तरीक़े से नही जिसमे कभी कभी छोटा मोटा विवाद मतभेदों को लेकर या परंपरा को लेकर होजाता है पर हिंसक घटना नही होती । हाँ कुछ असामाजिक तत्व अशांति की नीयत से और मुसलमानों के बीच विवाद पैदा करने के लिए कुछ कार्य ऐसे कर जाते हैं जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हो और विवाद होजाए। पर उसका सीधे तौर पर शिया समुदाय से कुछ लेना देना नही है। पूर्व में शिया सुन्नी विवाद अशिक्षा और असहमती की वजह से होता था पर अब दोनों समुदाय का मत एक ही है और सभी अब शिक्षित है सहमती से सारे कार्य होजाते हैं। बहुत सारे ऐसे संवेदनशील स्थान थे जहां जिसे शिया सुन्नी विवादित स्थल माना जाता था पर अब जागरूकता और शिक्षा से दोनों समुदाय में आपसी सहमती बन चुकी है तथा दोनों समुदाय को कोई आपत्ति नही है। अशिक्षा असहमती और गलतफहमी से पूर्व में कुछ विवाद हुवे हैं पर अब ऐसा बिल्कुल नही है अब शिया सुन्नी अलग अलग नही बल्कि उम्मत ए मोहम्मदी के दो बाज़ू है। जो अतीत में हुआ उसे तो जाकर बदला नही जा सकता ना सही को ग़लत किया जा सकता है ना ग़लत को सही पर भविष्य में होने वाले विवादों को पूर्व की घटनाओं से सबक लेकर सुधार जा सकता है इसी उद्देश्य से दोनों समुदाय में अब आपसी समझ पैदा होचुकी है दोनी समुदाय को भी इस बात का एहसास होगया है कि उन बातों पर लड़ने से कोई फ़ायदा नही है जिसका उनसे कोई लेना देना नही क्योंकि सज़ा और जज़ा का हक़ अल्लाह का है वो जिसे चाहेगा जन्नत में भेजेगा जिसे चाहेगा जहन्नुम में हर इंसान अपने आमाल के आधार पर जन्नत जहन्नुम में जाएगा इसलिए आपस में लड़ने का कोई औचित्य नही है अब दोनों समुदाय के ओलेमा ने इन बात को महसूस कर लिया है और एकता तथा भाईचारे पर ही सारा ज़ोर है ये कहना ग़लत है कि मुहर्रम में हिंसा होती है विगत वर्षों से ऐसा कुछ भी नही हुआ और दोनों समुदाय बहुत शांतिपूर्ण ढंग से मुहर्रम की शोक सभा आयोजित करते है तथा दोनों समुदाय की भावनाओं का ख़्याल करते हैं।

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