क़दीम, कसीर, हीन,मुद्दत,ज़माना क्या है। वो बातें जो हमे नही बताई गई पार्ट-2
आज जो इस्लाम का चेहरा दुनिया को दिखाया जा रहा है इस्लाम बिल्कुल उसके उलट था पर आज के जाहिल मुसलमानों ने उस इस्लाम का हुलिया बिगाड़ दिया। इसी दिन के लिए रसूल ए ख़ुदा (सअ) ने फ़रमाया था मैं तुम्हारे दरम्यान दो ज़िलाक़द्र चीज़े छोड़े जा रहा हूँ अगर इससे जुड़े रहोगे तो कभी रुस्वा और ज़लील नही होंगे। एक क़ुरआन और दूसरी अहलेबैत अलैहिस्सलाम। पर अफ़सोस ना आज का मुसलमान क़ुरआन को समझ सका ना अहलेबैत को।
जिस यूरोप में आज वैज्ञानिकों की भरमार है कभी आप ने सोचा है कि सत्तरहवी शताब्दी से पहले तक कोई वैज्ञानिक क्यों नही हुआ ? छठी शताब्दी से लेकर तेरहवीं शताब्दी तक इस्लाम का गोल्डन पीरियड था उस वक़्त दानिशवरों की फौज खड़ी होगयी थी जिसमे फ़ादर ऑफ केमेस्ट्री जाबिर इब्ने हय्यान (जिसे यूरोप में जबर या जेब के नाम से जाना जाता है) अल किन्दी, फादर ऑफ मेडिसिन अबू अली सेना (अविसिन्ना) सर्जरी के मास्टर अल जवाहिरी, अलजेब्रा का ईजादकर्ता अल-ख़्वारिज़्मी, उमर ख़य्याम, फ़ादर ऑफ ऑप्टिक्स इब्ने अल हैथम (अलहज़ेन), इस्हाक़ बिन अली, जाफ़र मोहम्मद इब्ने मूसा, नसरुद्दीन तूसी, कुतुबुद्दीन अल शीराज़ी ने इंद्रधनुष बनने की सही वजह दुनिया को बताई।
सल्फ्यूरिक एसिड, हाड्रोक्लोरिक एसिड, इत्यादि की खोज जाबिर इब्ने हय्यान ने की थी।
मुसलमानों को लगता था कि पूरी दुनिया पर काबिज़ होगये हैं अब उन्हें इल्म की ज़रूरत नही इसी ग़फ़लत मे वो ऐशोआराम की ज़िंदगी गुज़ारने में लग गए और इल्म से दूरी अख्तियार कर ली। जिस पश्चिम में आज तरक़्क़ी का बोल बाला है वहां जाहिलियत का ये आलम था कि विज्ञान और गणित की बातें करने पर सूली पर चढ़ा दिया जाता था। खाना बदोश जीवन जीते थे इधर से उधर फिरते थे। न्यूटन से लेकर आइंस्टीन तक किसी ने भी ना उच्च शिक्षा हासिल की थी ना ही कहीं उनके गुरु का ज़िक्र आता है फिर एकाएक वो इतने महान वैज्ञानिक कैसे बन गए ? यानी जो चीज़े उन्होंने जानी वो पहले से कहीं ना कहीं मौजूद थी जिसका इस्तेमाल करके वो आगे बढ़े। थॉमस अल्वा एडिसन ने तो स्कूली शिक्षा तक हासिल नही की मंदबुद्धि बच्चा समझ कर स्कूल से निकाल दिया गया था फिर इतनी तरक़्क़ी की बल्ब का अविष्कार किया। बहुत सारे ऐसे वैज्ञानिक है जहाँ पैटर्न और अविष्कार को लेकर उनमे लड़ाई है इसका मतलब दोनों के पास एक जैसा इल्म था जिसकी बुनियाद पहले रही होगी जिसे सीख कर उन्होंने अविष्कार किया।
यूँही नही हदीस है कि इल्म तुम्हारी मीरास है उसे हासिल करो। आज क़ौम की ज़िल्लत और रुसवाई की वजह हमारे जाहिल ज़ाकिर और ख़तीब है जिन्होंने इस पहलू पर कभी ग़ौर नही दिलाया ना दुनिया को बताया।
मौला अली अलैहिस्सलाम ने ना जाने कितनी चीज़ों का जवाब दे दिया जिसका जवाब आज दुनिया रिसर्च करके हासिल कर रही है पर इस तरफ कभी ग़ौर ओ फ़िक़्र नही किया हमारे ख़ातिबो ने।
के चंद सवाल जवाब जिसपर ग़ौर ओ फ़िक़्र करने की ज़रूरत है जो क़ुरआन के छुपे हुवे ख़ज़ाने है जिसे मौला अली ने दुनिया को बताया पर जाहिल मुसलमानों ने कभी ग़ौर नही किया। ये ऐसे जवाब है जिससे गणित, विज्ञान, तर्कशास्त्र का इल्म मिलता है ज़हन मज़बूत होता है पर लोगों ने ग़ौर नही किया।
मौला अली से पूछा गया वो कौन कौन से जानवर है जो अंडा और बच्चा देते हैं ?
मौला अली ने फ़रमाया जिस जानवर के कान बाहर होते हैं वो बच्चा देते हैं और जिस जानवर के कान अंदर होते हैं वो अंडा देते हैं।
इस बात को दुनिया ने आज रिसर्च से जाना जबकि ये जवाब सैकड़ो साल पहले हमारे पास मौजूद थे।
पृथ्वी से सूरज की दूरी कितनी है
मौला अली का जवाब। जितनी सूरज की एक दिन की पूर्व से पश्चिम की दूरी है।
अक़्ल दिमाग़ में होती है हँसी जिगर में होती है और आवाज़ फेफड़े में होती है।
अभी तक दुनिया अक़्ल और दिमाग़ को एक समझ रही है पर मौला अली के इस जवाब के बाद इस पर ग़ौर करनी चाहिए इससे कई सारी दिमाग़ी बीमारियों का इलाज मिल सकता है। हँसी जिगर में होती है ये भी एक रिसर्च का पहलू है कि हँसने से जिगर को क्या फ़ायदा होता है ऐसा क्या है हँसी में जिसका संबंध जिगर से है। आवाज़ फेफड़े में होती है यानी अभी तक हम आवाज़ को यही समझते थे कि ये गले से निकलती है जबकि इसका संबंध फेफड़े से है ये भी एक बहुत बड़ा शोध का विषय है जिसपर ग़ौर करना चाहिए।
हज़रत अली अलैहिस्सलाम से एक शख़्स ने कहा वो औरत पर क़ुदरत नही रखता है यानी वो नामर्द है।
मौला ने क़म्बर से कहा जाओ इसको ज़मीन पर पेशाब कराओ अगर पेशाब की धार से ज़मीन में सुराख़ होजाते हैं तो इसका आल ए तनासुल सही है
इसी तरह एक और मसले में फ़रमाया की पानी में खड़ा कर के देखो अगर अला ए तनासुल मे कोई हरक़त ना हो तो ये सही कह रहा है अगर सिकुड़ता है तो ये झूठा है। इतने बड़े मसले का हल इतनी आसानी से निकल गया, जिसके लिए आज दुनिया लाखो का इलाज करवाती है वो मसला बिना पैसा ख़र्च किये हल किया जा सकता है।
ये तो हुई चंद विज्ञान की बातें अब ज़रा क़ुरआन की रोशनी में गणित का हल देखते हैं और उस बात को जानते है जिसे दुनिया नही जानती है।
एक शख़्स ने वसीयत की उसके मरने के बाद फलां काम में एक जुज़ा ख़र्च किया जाए लोगों को इल्म ही नही की जुज़ा क्या होता है मौला अली के पास गए मौला ने फरमाया दौलत का सातवां हिस्सा जुज़ा कहलाता है। इसकी दलील में क़ुरआन की ये आयत पढ़ी
इसके लिए सात दरवाज़े है हर बाब के लिए एक जुज़ बंटा हुआ है।
दौलत के अधिकतम दसवाँ भाग और कमसे कम सातवां भाग जुज़ा कहलाता है
सहम के क्या मायने है ?
एक शख़्स ने वसीयत की उसके मरने के बाद एक हिस्सा "सहम" ख़र्च किया जाए। सहम के बारे में लोगों ने मौला अली से पूछा मौला अली ने फ़रमाया आठवें हिस्से को निकाल दो यानी पूरी दौलत का आठवां हिस्सा सहम है। उसकी दलील में क़ुरआन की ये आयत पढ़ी
सदकात तो सिर्फ़ मोहताजों के लिए है,नीज़ मिस्कीनों (ग़रीब) के लिए है और उस कारकुनों के लिए जो उसकी वसूली पर मुय्यन हैं और उनके लिए जिसकी दिलजोई मंज़ूर है। नीज़ गुलामों को छुड़ाने के लिए और कर्ज़दारों का क़र्ज़ अदा करने के लिए और ख़ुदा की राह में (जिहाद) सर्फ़ करने वाले और परदेसियों के लिए ।
ख़ुदा ने इस आयत में आठ किस्म के लोगों का ज़िक्र किया है और हर क़िस्म के लिए सदकात का एक हिस्सा है।
एक शख़्स ने कहा मेरे क़दीम ग़ुलाम को आज़ाद करदो। लोगों ने मौला अली से पूछा क़दीम क्या है मौला ने फ़रमाया जो ग़ुलाम छह महीने पहले के हो उसे आज़ाद करदो इसके लिए मौला अली ने क़ुरआन की ये आयत पेश की।
हमने चाँद की सैर के लिए मन्ज़िले भी बना दी है जिनमे वो गर्दिश (चलता फिरता) करता रहता है यहाँ तक कि अपनी आख़िरी मन्ज़िल में पहुँच कर ख़जूर की "क़दीम" टहनी सा नज़र आने लगता है। ख़जूर का फल तोड़ने के छह महीने बाद उसकी पत्तियां झड़ जाती हैं।
हीन के मायने
एक शख़्स ने कहा वो एक हीन तक रोज़े रखेगा
मौला अली से पूछा गया हीन क्या है ? मौला अली ने क़ुरआन की ये आयत पेश की।
" वह हर हीन अपने परवरदिगार के हुक़्म से फ़ल लाता है। और ये मालूम है दरख़्त ए खुरमा (ख़जूर) पर छह महीने में फ़ल आता है"।
एक शख़्स ने कहा वो अपने माल से "कुछ चीज़" देता हूं। मौला अली ने फ़रमाया क़िताब में कुछ चीज़ छह में से एक हिस्सा है।
एक शख़्स ने नज़र की मै एक ज़माने तक रोज़ा रखूँगा। मौला अली से लोगों ने पूछा मौला ने कहा ज़माना पाँच महीने का और हीन छह महीने का होता है।
एक शख़्स ने माले कसीर ख़र्च करने की नज़्र की। मौला अली ने फ़रमाया अल्लाह ने क़ुरआन में रसूलअल्लाह और मुसलमानों को ख़िताब करके फ़रमाया "हमने कसीर मुक़ामात पर तुम्हारी मदद की" अहदे पैग़म्बर में अस्सी ग़ज़वा (जंग) पेश आए थे कुछ रवायतों में तिरासी (83) का भी ज़िक्र है यानी कसीर से मुराद अस्सी (80) या तिरासी (83) है।
अफ़सोस है कि इतनी सारी ज़हनी और इल्मी बातें क़ुरआन में होते हुवे भी क़ुरआन का आधा हिस्सा लोगों को बताया ही नही गया। इस्लाम तलवार की नोंक पर नही बल्कि इल्म के बल पर दुनिया में फैला है। क़ुरआन ख़ुद कहता है दीन में कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नही है। दुनिया में इस्लाम की सूरत ख़ुद मुसलमान ने ही बिगाड़ी है अपनी जाहिलियत से। क़ुरआन इल्म का छुपा हुआ ख़ज़ाना है उसे दुनिया के सामने लाया जाए।
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