अदब ओ तहज़ीब के दायरे में शायरी होनी चाहिए। अहलेबैत अस. तू तड़ाक नही करते।
रसूलअल्लाह स.अ से लेकर आले रसूल स.अ के नामों में अदब ओ तहज़ीब को बिल्कुल ख़त्म करके अपने रदीफ़ ओ क़ाफ़िया के लिए बहर के अंदर शेर कहने के लिए और ज़ाकिरों को आसानी के लिए ईजाद किया गया है तू तड़ाक।
चाहे किसी अम्बिया अस. से ख़ुदा मुख़ातिब हो या रसूल आले रसूल किसी से क़लाम कर रहे हो उसमे शायरों ज़ाकिरों,ख़ातिबों ने और अनुवादक ने तू तड़ाक से ही मुख़ातिब किया।
भला जिसके इल्म का मयार इतना बुलन्द हो वो अपने से बड़े को तू कहेगा ?
हर्गिज़ नही, ये शायरों और ज़ाकिरों कि ज़बान हो सकती है अम्बिया, ख़ुदा, रसूल (स) और आले रसूल अस. की बिल्कुल नही।
शहज़ादी सकीना अपने बाबा से तुम कहेंगी ?
हज़रत ईमाम हुसैन अस. अपने बच्चे को तू कहेंगे ?
हर्गिज़ नही जिसके घर की इल्म मीरास हो उस घर के बच्चे अपने से बड़े को तू तड़ाक हर्गिज़ नही करेंगे अदब ओ तहज़ीब का एक मयार था जो धीरे धीरे शायरों ने ख़त्म कर दिया।
क्या हो जाएगा अगर आप लोग "तू" तुम" की जगह आप लफ़्ज़ को इस्तेमाल कर लेंगे ?
आज कल के नौहाख्वां और ख़तीब भी बारीक़ी पर बिल्कुल ग़ौर नही करते हैं कि किसके नाम मे अदब होना चाहिए किसके नाम मे नही।
मसलन जैसे हज़रत ईमाम हुसैन अस ने अपनी चार साल की बेटी से क़लाम करेंगे जैसे "तू बाबा कहती है" यहाँ "कहती" चल जाएगा लेकिन अगर शाहज़ादी सकीना अपने बाबा से क़लाम करेंगी तो उसमें अंक की बिंदी का इज़ाफ़ा होगा जैसे कहती "कहतीं" थोड़ा नाक से पढ़ा जाएगा जहाँ कहती में बिंदी लगने से " कह-ती 'इन हैं इस तरह ये अदब की ज़बान हो जाएगी।
उसी तरह अगर छोटा बुला रहा है तो उसमें "है" होगा लेकिन बड़े से हम क़लाम हैं और कोई छोटा बड़े को बुला रहा है तो उसमें "है" नही "हैं" ह-ऍन इस तरह पढ़ा जाएगा।
वैसे ही आख़िर में आने वाला लफ्ज़ छोटा या कोई सहाबी या कोई ख़ादिम अपने आक़ा, अपने मालिक,अपने वालिद,बड़ी बहनोंसे,बड़े भाइयों से, बड़ी फूफी,चाचा या जो भी ओहदे में बड़ा है उनसे मुख़ातिब है, हम क़लाम है तो वहाँ आख़िर में जैसे हैं,कहती,लेती,देती,होगी,जाएगी, इत्यादि आएगा तो उसमें थोड़ा नाक से सहारा लेकर कहा जाएगा उसमे "एन"इन" ये होगा जिससे अदब की ज़बान हो जाएगी और जब कोई ओहदे में बड़ा अपने छोटे से हम क़लाम है मुख़ातिब है तो वो "है,कहती,होगी,जाएगी,आएगी,लेगा,देगा,करेगा, इत्यादि आख़िरी लफ्ज़ में "एन-इन" नाक से निकलने वाली "अंक की बिंदी (.) में इज़ाफ़ा नही करेगा।
आज ज़्यादातर ख़तीब,शायर, नौहाख्वां, मनक़ब्त ख्वां, हदीस ओ नात ख्वां अदब ओ तहज़ीब को भूल चुके हैं कि किसके नाम को अदब से लेना है किसके नाम को साधारण तरीक़े से। रसूल और आले रसूल के नाम को ख़ुदा और अम्बियाओं के नाम को अदब ओ तहज़ीब से ही लेना चाहिए। ना ये अल्लाह की ज़बान हो सकती है ना अम्बिया ओ रसूल, आले रसूल की।
कौन किससे हम क़लाम है इससे कोई मतलब नही बिल्कुल टपोरियों वाली भाषा का इस्तेमाल किया जाता है ऐ तू इधर ऐ ऐ तू ये कर वो कर।
ये क्या है अगर आपको ज़बान की समझ नही है मत करें शायरी, मत करें अनुवाद, इंसान के गुफ़्तगू से पता चलता है वो कौन से रस का शब्द है।
तू तड़ाक में रहमान ओ रहीम से लेकर रहमत-उल-लील-आलमीन तक को आप ऐसे पेश करते हैं जैसे ज़बरदस्ती कोई काम करवाया जा रहा हो ऐसे शब्द हिंसक, विरोधभाव के लगते हैं, ये शब्द नही तानाशाही लगती है।
जैसे माज़ अल्लाह अल्लाह ज़ुल्म कर रहा हो ज़बरदस्ती उन काम को करवा रहा हो। जिसके नाम में जिसके अनुवाद में शहद जैसी मिठास होनी चाहिए थी वहाँ कड़वाहट है। क़ुरआन ओ हदीस का अनुवाद ऐसी तरह है कि उसको ग़ैर मज़हब के लोग देख कर समझते हैं "काफ़िर" शब्द हिन्दुओ के लिए है।
जबकि कुफ़्र से बना काफ़िर यानी जिसके अंदर ये था कोई कुछ नही है कोई ईश्वर कोई महात्मा कोई पूज्नीय नही है। वो शैतान की पूजा करते थे। हिन्दू धर्म मूर्ति पूजा होती है लेकिन चरित्र और पूजनीय व्यक्तित्व की जिसका इतिहास रहा है जिसने जन कल्याण के लिए मानवता के लिए कार्य किया।
जैसे शंकर जी की इन्होंने अमृत मंथन के समय निकला ज़हर पी कर मानवता की रक्षा की, श्री राम जी ने मानवता और पुरुषोत्तम का परिचय दिया हक़ और बातिल का फ़र्क़ बताया। ये क़ुरआन के लफ़्ज़ अनुसार काफ़िर नही है बल्कि शैतान को पूजने वाला, और ये खुराफ़ात जनाबे सुलेमान अस. के इंतेक़ाल के बाद शुरू हुई जिसमें उनके वज़ीर ने शैतान के बहकावे में आकर शैतान की मूर्ति पूजा शुरू करवाई, जादू टोना, काला जादू सिखाया, उसके बाद से शैतान की मूर्ति बना कर पूजा होने लगी जिसे क़ुरआन ने "काफ़िर" कहा।
ऐसे ही हज़ारों शब्द है जिसको विस्तार पूर्वक समझाने की ज़रूरत है। भला अरब में क़ुरआन आया जहाँ एक भी हिन्दू नही था यहूदी ईसाई मुसलमान थे अल्लाह हिन्दू को क्यों काफ़िर कहता ? जिससे कोई वास्ता नही जिसका कोई सार नही सारी जंग मुसलमान और यहूदी में हुई आयत मुसलमान पर आई क़बीला मुसलमान का लोग यहूदी और मुसलमान। जैसे हमारे हिन्दू भाई कहते हैं कि आपकी क़ुरआन में हिन्दू को काफ़िर कहा गया है। ऐसा हर्गिज़ नही है। ये बस आप लोगों की ग़लतफ़हमी है और कुछ नही।
लफ़्ज़ों का सही चयन और विरोधात्मक तलफ़्फ़ुज़ की वजह से ऐसा लगता है। जबकि वो कब कहाँ किसके लिए कहा गया है ये आप किसी आलिम पढ़े लिखे मुसलमान से पूछ सकते हैं।
बरहाल ज़रूरत है लफ़्ज़ों को सही से इस्तेमाल करने की वरना मक़सद ए कर्बला लफ़्ज़ों से ही आप लोग ख़त्म कर देंगे ऐसा क़ातिल को मज़लूम और मज़लूम को क़ातिल की तरह अपने लफ़्ज़ों में पेश कर के
रस चार ही है
करुणा
वियोग
हास्य
वीर
इसी तरह अरबी और उर्दू ज़बान में भी ग़म ओ जुदाई के लिए क्या इस्तेमाल करना है शुजात ओ दिलेरी के लिए क्या, सख़ावत ओ मस्कारे पन के लिए क्या। अगर इन बुनियादी बातों का ध्यान नही देंगे कर्बला को आप अपने लफ़्ज़ों से अपने अल्फ़ाज़ों से ही पामाल कर देंगे।
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