परवरिश ओ ज़बान मुसीबत का सामान

मैं बहुत परेशान हूँ ।

 रिज़्क़ तंग होगया है । 

घर से ख़ैर ओ बरक़त ख़त्म होगयी।

 ना जाने क्यों ऐसा हुआ ?

हम तो बहुत नमाज़ दुआ करते थे फिर ऐसा क्यों ?

 कौन सा ऐसा ग़ुनाह होगया ?

और इसी सब मे इंसान अवसादग्रस्त होने लगता है उसका अपनी क़ाबिलियत और हुनर पर से यक़ीन उठने लगता है उसे लगता है वो कुछ नही कर सकता और धीरे धीरे वो अंदर से टूटने लगता है।

 पर कभी सोचा है मुसीबत आने की वजह क्या है ?

 क्यों रिज़्क़ तंग हुआ ? 

क्यों घर से बरक़त ख़त्म होगयी ? 


उसकी वजह आपकी औरतें आपकी बेटियाँ आपकी औलाद  है।

जब घर के अंदर ख़ुदा से ज़्यादा दूसरों का तज़किरा होगा तो क्या होगा।

दुसरो की ग़ीबत, चुगली, होगी एक दूसरे से हसद रखा जाएगा।

 नंद, जेठानी, देवरानी, भाभी, सास सभी से ताल्लुक़ात तल्ख़ कर लिए जाएंगे।

जिन बेटे बेटियों के सामने उनके मुस्तक़बिल और इंसानियत की बात करनी चाहिए वहाँ आप गड़े मुर्दे निकाल कर अपने रिश्तेदारों के ऐबों को बताते हैं।

जिसको ये भी नही पता आपके साथ क्या हुआ था उसे भी आप बताते है फलाँ शख़्स ने ऐसा किया था अपने बेटे बेटियों के दिमाग़ में हसद और जलन का ख़ुद का लगाया हुआ बीज बोते है।

 वो ना चाहते हुवे भी अपने नाते रिश्तेदारों से हसद ओ जलन रखने लगता है।


दुनिया भर का तज़किरा घर में किया जाएगा जाने अनजाने रोज़ दिन में सुबह उठ के ख़ुसूर पुसुर से ग़ीबत और चुगली का सिलसिला शुरू होकर रात तक चलता है।

यही ज़हर आगे जाकर आपकी बेटियों/बेटे का घर बर्बाद करता है।

 फिर आप कहेंगें अल्लाह ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया?

जब बबुल बोयेंगे तो आम कहाँ से आएगा? 

जो तरबियत आपने उसे बचपन से दी उसने उसी को को सीखा जाना।

मुसीबतें ज़बान से नाज़िल होती है।


 रिज़्क़ आदमी के ज़रिए से आता है कमाने वो जाता है।

 औरत को घर की ज़िम्मेदारी दी गयी है और मर्द को कमाने खिलाने की।

मर्द खानाबदोश होता है वो रिज़्क़ की तलाश में इधर से उधर भटकता है दिन रात मेहनत करता है फिर भी क़ामयाब नही होता तो उसकी यही वजह है।


 मौला अली अ. स. ने फरमाया अपनी ज़बान को क़ाबू रखो क्योंकि मुसीबत आपकी ज़बान से नाज़िल होती है।

अब जो घर का खैरख़्वा रहेगा जो घर का खर्च चलाएगा रिज़्क़ उसका तंग होजाता है।

क्योंकि घर उससे चलता है वो ग़िज़ा का इंतेज़ाम करता है। जिसे खा कर उसी ज़बान से आपकी ज़ौजा, बहन, बेटी, बेटा दूसरों की ग़ीबत, चुगली करती है।

अल्लाह की ईबादत से ज़्यादा मुआशरे की ईबादत करते है।

एक बार एक आलिम यूरोप गए, वहाँ के बहुत बड़े व्यापारी ने अपनी एकलौती बेटी की ग़ैर मुस्लिम से शादी की ज़िद पर उसे समझाने को कहा।

आलिम साहब बेटी के पास गए, उससे पूछा क्या सबब बना जो आप एक नेक़ इज़्ज़तदार घराने की शरीफ़ ख़ातून होते हुवे भी, आपने अपने लिए किसी ग़ैर मज़हब के लड़के को पसंद किया जबकि आपके ख़ानवादे में तमाम नेक़ ओ शरीफ़ क़ाबिल लड़के मौजूद थे ?


उस ख़ातून का जवाब दुनिया की हर लड़की के लिए इतिहास के पन्नों में महफ़ूज़ होगया है, आप भी इसे नश्तर की तरह अपने कलेजे में पेवस्त कर लीजिए।


उस ख़ातून ने कहा, आग़ा साहब आप किन रिश्तेदारों, किन ख़ानवादे की बात कर रहे हैं, वही जो वालिद साहब सुबह से शाम तक वालिदा के रिश्तेदारों को ख़ानदान को बुरा कहते हैं और वालिदा, वालिद के रिश्तेदारों और ख़ानदान वालों को।

शादी का फैसला तो वालिदैन का होता है ना ?

जब वालिदैन का ख़ानदान इतना बुरा है जिसके लिए सुबह शाम लअनत मलानत होती है भला उस ख़ानदान में उन रिश्तेदारों में क्योंकर जाएं हम ?

इससे जब तमाम मुआशरा ओ ख़ानदान बुरा है तो हमने सोचा क्यों ना अपने मज़हब अपने लोगों से दूर हट कर, ग़ैर मज़हब के लड़के को ही अपना हमसफ़र बनाया जाए। क्यों उस बुराई में  जाये जिसकी वक़ालत हमारे वालिदैन सुबह ओ शाम करते हैं ?

आलिम साहब को बात समझ में आगयी, ग़लती लड़की की नही वालिदैन की है, घर में अगर दूसरों की बुराई होगी बच्चे वही सीखेंगे।

ये बच्चे आग नही उगलते, उनकी परवरिश आग उगलती है।

अगर वालिदैन बच्चों की अच्छी परवरिश करे बच्चे कभी ग़लत राह पर नही जाएंगे।

पर वालिदैन तो बच्चों को और बढ़ावा देते हैं, जा मार दे काट दी गलियां दें, औक़ात दिखा दें, ससुराल छोड़ के घर आजाओ, केस कर दो।

ऐसे में बच्चे क्या सीखेंगे ? जैसा घर का माहौल रहेगा बाहर अल्फ़ाज़ ऐसा ही मुजरा करेगा।

बच्चों की अच्छी परवरिश करें, उन्हें दीन ओ दुनिया सिखाए, सब्र ओ इंसानियत सिखाए ना कि उनकी हर ग़लत आदत को उनकी शान बना दें।

आदिल ज़ैदी काविश

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