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ना किसी दवा से ना हथियार से इंसान ख़ुद ही मर जाएगा एहसास ए कमतरी के वार से

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इस दुनिया में हर किसी को सब कुछ हासिल नही होता वो उसे हासिल करने की कोशिश करता रहता है। हर किसी के अंदर कुछ ना कुछ कमी ज़रूर है और उसी कमी को कहते हैं "लोग क्या कहेंगे" ये दुनिया का सबसे बड़ा मर्ज़ है सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग जो इंसान को जीते जी मार देता है,उसके लिए ना कोई हथियार चाहिए ना कोई दवा ना कोई जदीद तरीक़ा बस एहसास ए कमतरी को अपने दिल में बैठा ले नज़र ए हक़ीर होजाएं फिर देखिए कैसे आपकी ज़िन्दगी तबाह और बर्बाद होती है। ये दुनिया हैं यहां हर किसी के अंदर कुछ ना कुछ कमी ज़रूर है किसी के पास दौलत है तो सेहत नही सेहत है तो दौलत नही दोनों है तो वक़्त नही वक़्त है तो दौलत नही वक़्त है पर इल्म नही इल्म है पर सेहत नही सेहत ओ दौलत है पर सुकून नही। सेहत वाला दौलत वाले से परेशान हैं कि उसके पास इतनी दौलत है दौलत वाला उसकी सेहत से परेशान है कि ये लम्बा ताडंगा और सेहतमंद कैसे हैं। सेहतमंद इल्म वाले से परेशान है कि उसके पास इल्म नही इल्म वाला अदब ओ तहज़ीब से महरूम है अदब ओ तहज़ीब वाला महफ़िल से महरूम है महफ़िल वाला अमल से महरूम है।  आपको अंग्रेज़ी नही आती आप बाहर जाते हैं चार लोगों...

संयुक्त परिवार में शादी करने के क्या फ़ायदे हैं इससे जानकर चौंक जायेंगे आप

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शीतल (काल्पनिक नाम) की पढ़ाई पूरी होते ही घर वालों ने रिश्ता ढूंढना शुरू कर दिया।शीतल नाज़ों की पाली लड़की थी घर के काम से मतलब कभी नही था ना किसी बात का हुनर था कुछ था तो लम्बी ज़बान और खूबसूरती ए आसमान। शीतल के परिवार वाले चाहते थे कोई छोटा मोटा परिवार हो जहां शीतल की शादी होजाए ज़िन्दगी का गुज़र बसर अच्छे से हो लड़का पढ़ा लिखा और अच्छा कमाता हो। शीतल के दिल में कुछ और ही था लड़का डेशिंग हो हैंडसम हो पैसे वाला हो और परिवार छोटा हो, शीतल की खूबसूरती को देख कर रिश्तों की लाइन लग गयी उसमे से आकाश (काल्पनिक नाम) का रिश्ता उसे पसन्द आया करोड़पति था हैंडसम था पर संयुक्त परिवार (Joint Family) से था आकाश को भी शीतल पहली ही नज़र में भा गयी। आकाश तीन भाई और 3 बहनों में सबसे बड़ा था साथ ही तीन चाचा चाची उनके बच्चे दादा दादी भी थे भला बड़े बेटे की पसन्द को कैसे इनकार किया जा सकता था आकाश और शीतल की सगाई होगयी दोनों आपस में बात करने लगे। शीतल और आकाश में प्यार होगया दिल से नही शीतल को आकाश की दौलत से और आकाश को शीतल की खूबसूरती से इतने दिनों तक बात करके आकाश को शीतल की मंशा का अंदाज़ा भी नही हुआ कि...

फेसबुक पर कैसे ब्लॉक् होती है आईडी जाने इस पोस्ट में

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प्रवीण बहुत सक्रीय (एक्टिव) रहता था सोशल मीडिया पर उसके लेख को काफ़ी सराहना भी मिलती थी पर एक दिन अचानक प्रवीण की किसी पोस्ट की वजह से फेसबुक पर उसकी आईडी ब्लॉक कर दी गयी प्रवीण समझ नही पाया ऐसा क्यों हुआ है उसके साथ । केस : 2 : आकांक्षा (काल्पनिक नाम)अपने परिवार से छुप कर अश्लिल वीडियो देखा करती थी और अपने दोस्तों से व्हाट्सएप पर चैटिंग करती थी एक दिन आकांक्षा के पिता ने उसका मोबाइल मांगा और उसका फेसबुक खोला जैसे ही उन्होंने देखा उनके होश उड़ गए आकांक्षा के फेसबुक न्यूज़ फीड में केवल गंदी गंदी फ़ोटो, ग्रुप, वीडियो, और ऐसे ही दोस्तो का सजेशन आने लगा। आकांक्षा ने पिता ने उसका मोबाइल छीन लिया और उसपर मोबाइल इस्तेमाल करने की पाबंदी लगा दी। उसे ये समझ में नही आया जो फेसबुक तो वो ना इस तरह का कुछ सर्च करे ना किसी तरह की ऐसी बातें हो और ना ही ऐसा कोई वीडियो देखा हो फिर उसकी न्यूज़ फीड में इस तरह के अश्लील पोस्ट क्यों दिखाई दे रहे हैं । _________________________ ये समस्या सिर्फ़ प्रवीण या आकांक्षा के साथ नही होरही ये समस्या हर किसी के साथ होती है कभी आपने सोचा है आप जो गूगल पर सर्च करते...

श्री दहशत और जनाबे तबाही की एक ख़ास गुफ़्तगू

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बमरोधी दस्ता जैसे सूट बूट चार पाँच लोगों को अपनी तरफ आते देख कोने में पड़ा बम मुस्कुराने लगा मन ही मन सोचने लगा भौकाल टाइट है गुरु अपनी । हैं ये क्या ये साले किधर जा रहे हैं बम बुदबुदाते हुआ झुँझलाहट से कहने लगा अबे दहशत इधर पड़ी है तुम लोग किधर जा रहे हो। तभी देखा वो बमरोधी दस्ते जैसे दिखने वाले लोग किसी व्यक्ति को जल्दी से लेकर अंदर कमरे में लेकर भागते हैं उसके साथ ही अगल बगल मुँह पर चड्ढी पहने लोगों में भगदड़ मच जाती है हटो बचो भागो ये कोरोना पॉजिटिव मरीज़ है। बम डिफ्यूज़ से पहले कंफ्यूज़ ये क्या बलाह आगयी है बे मार्केट में। ये सोच ही रहा था कि उसके कान में एक अदृश्य आवाज़ सुनाई दी अरे बमवा सुन बे । बम सकपकाते हुवे कौन है बे किसकी इतनी हिम्मत हुई कि आतंक का दूसरा नाम बम वाले दहशत भाई को बे बोल रहा है । तभी सार्स 2 कोविड 19 कोरोना वायरस ने कहा ओह भूतनी मालूम है मालूम है चल अपने बाप को मत सीखा। रही होगी तेरी दहशत कभी पर 2019 से अपुन ही भगवान है दहशत का दूसरा नाम है तेरे नाम से लोगों की पैंट गीली होती है पर मेरे नाम से गला ना गीला होजाये इसीलिए सुसरे मुँह पर भी चड्ढी पहनने लगे हैं...

एक बहन जो अपने बड़े भाई के लिए माता-पिता बन गयी । पढ़िए एक सच्ची कहानी मेरी ज़ुबानी

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आपसे निवेदन है कि इसे एक बार पूरा ज़रूर पढ़ें शेयर भी करें होसके तो मदद भी कर दे किसी ग़रीब की  ज़माने जदीद में मिलती नही मिसाल मिस्ले वालिदैन बनी एक बहन भाई के लिए जब औलाद माता पिता से मुँह मोड़ ले जब भाई शादी के बाद अलग होजाएं जब सारे ताल्लुक़ात मतलब की बुनियाद पे रख दिये जाएं उस दौर में कोई ऐसा है जो अपने परिवार वे लिए माता पिता की भूमिका निभाने लगा । आज हम आपको ऐसे ही एक लड़की की सच्ची कहानी बताने जा रहें हैं जो अपने भाई की ख़ातिर उसके लिए वालिदैन (माता पिता) का फ़र्ज़ निभाने लगी । सुनने में जितना आसान लग रहा है उसे महसूस करने में पत्थर भी रो देगा । ये कोई फ़िल्मी कहानी नही हक़ीक़ी कहानी है एक लड़की की जिसने हालातों के आगे हिम्मत नही हारी ना उसे उसकी ग़रीबी रोक सकी ना समाज की "लोग क्या कहेंगे" कि बनाई प्रथा जिसमे ये कहा जाता है एक लड़की घर से बाहर नही निकल सकती । शौक़ में कोई नही निकलता मजबूरियां दहलीज़  नाघाती है । एक लड़की से मेरी दोस्ती फेसबुक के माध्यम से हुई लड़की का नाम शाहीन (काल्पनिक नाम) हैं । उसकी पोस्ट उसकी हरक़तें देख के लगता था जैसे इस लड़की कोई कोई ग़म ही ना हो हमेशा अ...

कौन है हज़रत अली, जाने कब और कैसे हुई शेरे ख़ुदा की शहादत

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दुनिया में कौन ऐसा होगा जिसने हज़रत अली (अ. स) का नाम नही सुना होगा । कौन अली जिसको मदद के लिए पुकारों तो हर हाल में मदद होती है , हर मज़हब हर ज़ात हर रंग ओ ज़बान के लोग जिसे माने वो अली फिर चाहे वो मुसलमान हो या हिन्दू सिख ईसाई कोई ऐसा नही होगा जो हज़रत अली को मानता नही होगा । हज़रत अली मुसलमानों के चौथे ख़लीफ़ा और शियों के पहले ईमाम (नेता,रहनुमा,दिशानिर्देशक) हैं । हज़रत अली इंसाफपसंद इस्लाम पसंद करते थे । यतीमों और ग़रीबो को अपना दोस्त समझते थे जब अरब में ईसाई , यहूदी और मुस्लिम के बड़े बड़े घराने हज़रत अली को दावत पर बुलाते थे तो हज़रत अली ये कह कर मना कर देते थे की मेरी जगह इन यतीमों और ग़रीबो को दावत पर बुलाओ , रात के अंधेरे में छुप कर आप ग़रीबो के घर खाना पहुंचाते थे ।  आपसे बड़ा आलिम कोई नही था ना आपसे बड़ा कोई बहादुर आपसे दुनिया का कोई भी सवाल पूछा गया आपने उसका जवाब दिया आपने फ़रमाया ये सीना इल्म की दीवार है पूछ लो जो भी पूछना हो इससे पहले की मैं तुम्हारे दरमियान से चला जाऊं । आप जंग में भी अव्वल रहते थे और इल्म में भी आपने ही फ़रमाया कोई काम छोटा नही होता है ख़ुद अरब के सबसे मशहू...

मौत कोरोना से नही ,ऑक्सिजन की कमी जानिये किससे होरही है

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आज चारों तरफ बस एक बातें होरही है कोरोना वायरस और उसकी मौत की कहा जारहा है कोरोना वायरस की दूसरी लहर बहुत ख़तरनाक है । मीडिया दिखा रहा है रोज़ मौतें होरही है पर क्या ये मौत कोरोना वायरस से ही होरही है ? पिछले साल और इस साल में बहुत फ़र्क़ है पिछले साल ना प्राणवायु (ऑक्सिजन) का हाहाकार था ना मौत का सैलाब , ना रेमडेसिविर जैसी कोई दवा थी ना कोई स्पेशल ट्रेटमेंट । 80% मरीज़ ख़ुद बा ख़ुद ठीक होजाते थे कुछेक की मौत भी हुई । पिछले साल मलेरिया की दवा को कारगर बताया जा रहा था ना कोरोना का कोई इंजेक्शन था ना कोई दवा फिर भी लोग ठीक होजाते थे इस साल लोग इंजेक्शन भी लगवा रहे हैं तरह तरह की दवा खिलाई जा रही है फिर भी मौत हो रही है ऐसा क्यों ? या तो पिछले साल कोरोना नही था देश की जनता को परेशान कर दिया गया तरह तरह के प्रतिबंध लगा कर या इस साल है तो सरकारी लापरवाही से लोग मर रहे हैं । ना अस्पताल मे ICU बेड की पर्याप्त उपलब्धता है ना ऑक्सीजन की व्यवस्था है, जो डॉक्टर पिछले साल किसी कोरोना के मरीज़ को बिना PPE किट पहने छूते नही थे दूर से लोग भाग जाते थे आज वही लोग मरीज़ को छू रहे हैं देख रहे हैं वो भ...

कोरोना से जीतने से पहले ही मस्तिष्क के "डर" से हम हार जायेंगे

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चारों तरफ एक ख़ौफ़ का माहौल है , आज कोरोना के आगे सारी बीमारियों ने दम तोड़ दिया है । अब ना किसी के अंदर डेंगू दिखाई देता है ना मलेरिया टाइफाइड, दमा, न्यूमोनिया इंफेक्शन सब नदारद है , हर तरफ बस जिसे देखों यही कह रहा है कोरोना है । सामान्य सर्दी खाँसी ज़ुकाम बुखार वाला व्यक्ति भी ख़ुद को कोरोना का मरीज़ समझने लगा है   । हर तरफ से हलमीन नासरीन यनसुरना की सदा आने लगी है कोई किसी की मदद को आगे नही आरहा है ना किसी का पद प्रतिष्ठा काम आरहा है ना किसी का पैसा और सिफारिश , हमे लगने लगा है मौत हमारा मुक़द्दर है, अब बचना बहुत मुश्किल है । मीडिया ने अपना काम कर दिया उसे ख़ौफ़ पैदा करना था ख़ौफ़ पैदा कर दिया । हमारा दिमाग़ हमे संकेत दे चुका है हम कोरोना ग्रसित हैं अब हमें कोई नही बचा सकता है । अगर आप मनोचिकित्सक के नज़रिए से देखे सोचों तो आपको बहुत कुछ पता चलेगा । हमारे शरीर का सारा सिस्टम हमारे मस्तिष्क से ऑपरेट होता है हम जैसा सोचते हैं हमारा मस्तिष्क जिस्म को वही संदेश पहुँचा देता है ।  अगर हमने सोच लिया हम बीमार है तो ये नकारात्मक सोच हमारे शरीर की ऊर्जा को चूस लेती है शरीर का एक्...

शादियों में रस्म रिवाज खाना फ़िज़ूल है, ये तो बस चमड़ी बेच कर झूठी शान दिखाने का नाटक है

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शादी एक अज़ीम रिश्ता है ,ज़ात ए पाक़ की ख़लकीयत का बेहतरीन नमूना है अर्श ए आज़म से फ़र्श ए ज़मीन पर आने से लेकर फ़ना होजाने तक वालिदैन के बाद अगर कोई पाक़ रिश्ता होता है तो वो शादी का । पैदा होने से लेकर जवान होने तक मेरा बेटा ये बनेगा मेरा बेटा ये करेगा । बेटा अब तेरी शादी की उम्र होगयी है शादी कर ले । पैदाईश से लेकर खाक़ज़ाई तक इंसान के इर्दगिर्द शादी शब्द गूँजता रहता है । तब की शादियाँ और होती थी लड़का लड़की एक दूसरे को देखते नही थे काली, गोरी, मोटी ,लम्बी ,नाटी अमीर ग़रीब का रिवाज नही था । लड़का कमाता भी नही था फिर भी शादी के रिश्ते में बांध कर ज़िम्मेदारियों के हवाले कर दिया जाता था । बेलगाम घोड़े को राहे रास्त पर लाने का सबसे बढ़िया तरीक़ा शादी का रिश्ता ही था । नालायक़ से नालायक़ लड़का भी शादी के बाद सुधर जाता था । वो तब तक निभाता जब तक मौत उन्हें जुदा नही कर देती थी । इतना पाक़ रिश्ता था, होता भी क्यों नही जब रिश्ता अनजान हो एक दूसरे की कमी खूबी से वाक़िफ़ ना हो तो एक दूसरे को जानने समझने की दिलचस्पी ही अलग रहती है सालों लोग एक दूसरे का साथ हँसी खुशी से गुज़ार देते थे । पर अब ऐसा क्यों नही ह...

परीक्षा में बैठने से पहले ही आप फेल होजायेंगे अगर ऐसा करेंगे

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एक ज़माना था जब पढ़ाई होती थी अब का ज़माना है बस लड़ाई होती है । लड़ाई किस बात की नौकरी को हासिल करने की ,कभी संस्था से तो कभी कोर्ट से । नगीने मिलते थे नौकरी में अब सफीने मिलते हैं । नौकरी में पहले इतनी प्रतिस्पर्धा नही थी ना ही आज की तरह इतनी आधुनिकता और सुविधा फिर भी लोग बड़ी से बड़ी परीक्षा को पास कर लेते थे । तब हमारे बस संसाधन कम था ज्ञान अधिक था अब संसाधनों की कमी नही है ना ज्ञान और प्रतिभा की फिर भी हम फिसड्डी होते जा रहे हैं । सरकारी नौकरी के नाम पर गला काट प्रतिस्पर्धा में हम साम दाम दंड भेद सब कुछ लगा देना चाहते हैं , बस इसीलिए की एक सुविधाजनक नौकरी मिल जाएगी आराम से हर महीने पैसा आता रहेगा । या आईएएस आईपीएस बन कर अपनी मान प्रतिष्ठा को बढ़ा कर ज़माने पर रोब झाड़ा जायेगा । पहले सभी कहते थे बीए कर लो आगे चल कर आईएएस बन जाओगे अब तो बीए, बीएससी,बीकॉम बेकाम होगया है । आज आईएएस आईपीएस सबसे ज़्यादा टेक्निकल पृष्टभूमि वाले ,डॉक्टर इंजीनियर या किसी सम्मानित पद पर विराजमान व्यक्ति ही बन रहे हैं । दाल में नमक के बराबर एकेडमिक पृष्ठभूमि वाले परीक्षार्थियों का ही चयन होरहा है। सरकार भी ...

अल्लाह ने पहले ज़िन्दगी बनाई या मौत ? ज़िन्दगी सख़्त होती है या मौत ?

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क़ुरआन एक किताब नही एक पूरी क़ायनात है उसे समझने की ज़रूरत है पढ़ने की नही क्योंकि क़ुरआन का मायने ही पढ़ा हुआ है । क़ुरआन समझने के लिए आई है ताकि आप अपनी तक़लीफ़ों का हल इससे निकाल सकें । क़ुरआन की हर सूरह हमारी ज़िन्दगी से होकर गुज़रती है ज़रूरत है उसको समझने की पस अगर आपके दिल और नीयत पाक़ है तो आपको क़ुरआन और उसके लफ़्ज़ समझ आयेंगे वरना आपको बस एक अरबी क़िताब लगेगी । क़ुरआन ने कैसे हमारी ज़िन्दगी के हर मरहले को पहले ही बता दिया हमने कभी ग़ौर ही नही किया । सबसे पहले ग़ौर करते हैं क़ुरआन के दिल (सूरह यासीन) पर जिसका तर्जुमा कुछ इस तरह है *और हम जिस शख़्स को बहुत ज़्यादा उम्र देते है तो उसे खलक़त के उलट कर फिर बच्चों की तरह मजबूर कर देते हैं तो क्या वो लोग समझते नही*। इस आयत पर अगर ग़ौर करें तो तो बहुत सारे सवाल के जवाब आपको मिल जायेंगे बुजुर्गों का बीमार होना, बच्चों की तरह ज़िद्द करना पेशाब पैखाना बिस्तर पर कर देना जैसे बच्चे पैदा होते हैं मजबूर होते हैं वैसे ही उम्र ज़्यादा होने पर इंसान फिर से मजबूर होता है और ये क़ुदरत का नियम है जिसे अल्लाह ने क़ुरआन मे पहले ही बता दिया है । बुजुर्गों का इस उम्र म...

नशा किसी का भी हो जब सर पर चढ़ेगा तू घर को ही तोड़ेगा

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नशा किसी भी प्रकार का हो ख़तरनाक होता है बात करें अगर नशे के प्रकार की तो उसमें गांजा,अफ़ीम, हेरोइन, चिल्लम, कच्ची शराब, देसी शराब, अंग्रेज़ी शराब, तम्बाकू, गुटखा, सिगरेट, मुख्य है । कुछ स्थानीय नशा भी होता है कुछ आइंस्टीन की औलाद नया नया नशा ईजाद करते हैं जैसे सिगरेट की राख को चाय में घोल कर पीना आयोडेक्स को ब्रेड पर लगा कर खाना फँसाडील का सिरप पीना डाइजापाम का इंजेक्शन लगाना और भी बहुत सारे नशे करने के तरीक़े है और उनके कारोबारी है । अब बात करें अगर कैंसर की तो हर नशा अपने आप मे एक बीमारी है किसी प्रकार के नशे से आप ग्रेट खली नही बनते हैं । हर नशे की तरह जौनपुर में भी एक नशा होता है "दोहरे" का नशा जिसे जौनपुर वाले कैंसर का मुख्य कारक मानते है । जौनपुर में 3-4 दोहरा बहुत मशहूर माना जाता है शंकर, गणेश, राजू, का दोहरा उसके अतरिक्त जौनपुर में अब हर गली मोहल्ले में देखा देखी दोहरे का कारोबार फलने फूलने लगा । जिस तरह कोकाकोला बनाने की एक सीक्रेट रेसिपी होती है उसी तरह दोहरे की भी रेसिपी है जिस प्रकार बेनीराम की ईमारती कोई दूसरा नही बना सकता उसी तरह दोहरे के भी कुछ पद्धति ...

जब मज़दूर ने मालिक़ से पूछा आपको कितने पैसे चाहिए मैं देता हूँ

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हल जज़ाउल एहसान इल्ल एहसान  नेकी का बदला भला नेकी के सिवा कुछ है (सूरह रहमान) कभी कभी रिश्ते बनते नही है ख़ुद बा ख़ुद बन जाते हैं । इंसानियत के रिश्ते से बड़ा दुनिया में कोई रिश्ता नही होता है ।  ना कोई हिन्दू होता है ना कोई मुसलमान होता है  वक़्त पर जो काम आए वही बस इंसान होता है । ये कहानी नही एक सच्चाई है जो मैं आज आप लोगो को बताने जा रहा हूँ । इस कहानी है कि शुरुआत होती है लॉक डाउन से । मई में कोरोना और लोगों की मजबूरी चरम पर थी हर शख़्स मई में दो जून की रोटी को हैरान ओ परेशान था मार्च से लगे लॉक डाउन ने मई तक लोगो की क़मर ख़मीदा और हाल बोशीदा कर दी जो हालात पोशीदा दे वो मंज़र ए आम पर आगए । चारो तरफ अजीब सी खामोशी खाने की परेशानी और सुनाने को अपनी दुखभरी कहानी इसके सिवा कुछ नही बचा था । जो जहाँ था उसी जगह ठहर गया मानो वक़्त ने अपने आग़ोश में सभी को समेट लिया हो । रोज़ी रोटी और पैसा कमाने की चाह इंसान को उसके गाँव, शहर, वतन ले आयी थी इसी में आया था मेरे घर करंजाकला गाँव का जितेन्द्र नाम का एक मज़दूर । कहने को तो मज़दूर था पर दिल का राजा था । लॉक डाउन की फ़ुर्सत में घर पर ...

ओह मय गॉड इसने तो अक़ीदा जिहाद कर डाला अब क्या होगा

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लव जिहाद पर कानून बन गया क्योंकि इससे धर्मांतरण होता है । पर अक़ीदे जिहाद पर कानून बनाने के लिए ना सरकार ने कभी सोचा ना ही धार्मिक नेताओं ने । धर्म परिवर्तन से भी बड़ा मसला आस्था परिवर्तन का है उसपर कोई विचार नही करता । इस्लाम धर्म को मानने वाले मुस्लिम समुदाय में ही देख ले धर्म इस्लाम है समुदाय मुस्लिम है पर अक़ीदे जिहाद के चक्कर में खूंरेज़ी होजाती है । एक ही धर्म से भी होते हुवे शिया-सुन्नी अलग है क़ुरआन एक नबी एक अल्लाह एक बस अक़ीदा (आस्था) अलग होने से कई टुकड़ो में बंटे हुवे हैं । शिया सुन्नी में नही जा सकता सुन्नी अहले हदीस में नही जा सकता अहले हदीस देवबंदी को नही मानता देवबंदी बरेलवियों से नफ़रत करते है बरेलवी हनफ़ी को बुरा कहते है हनफ़ी चिश्तियों को बुरा कहते हैं उसमें भी सैय्यद में पठान को नही मिला सकते पठान अंसारियों को पसंद नही करते । सैय्यद, शेख़, पठान, अंसारी, मिर्ज़ा सिद्दीक़ी, क़ुरैशी, आलाने फलाने मतलब ये है कि सैय्यद को सैय्यद ही चाहिए हनफ़ी को हनफ़ी बरेलवी को बरेलवी देवबंदी को देवबंदी शिया को शिया ही । मजाल है कोई दूसरे अक़ीदे की लड़की से शादी करले । शिया सुन्नी मुसलमानों के...

जब पूर्वांचल विश्विद्यालय के लिए दान कर दिया था लगभग 800 बीघा ज़मीन । जानिए कौन है वो

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प्राचीनकालीन ऋषि यमदग्नि की तपोस्थली मुग़ल कालीन युग की प्रसिद्ध शिक्षास्थली जिसे शीराज़-ए-हिन्द जौनपुर के नाम से जाना जाता है । अपनी गंगाजमुनी तहज़ीब और भाईचारे के लिए विख्यात साथ ही राजनीतिक से लेकर बाहुबली माफियाओं का ज़िला जौनपुर । जनपद जौनपुर मुख्यालय के उत्तर में सुप्रसिद्ध माधोपट्टी गाँव जहाँ हर घर आला अधिकारी बस्ते है तो उत्तर में बसता है ज़िला जौनपुर का दिल जिसे जौनपुर रत्न कहा जाता है और वो है यहाँ पूर्वांचल विश्विद्यालय । पूर्वांचल विश्विद्यालय की स्थापना की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है जौनपुर को पूर्वांचल विश्विद्यालय कब कैसे मिला और किसकी भूमिका थी इसे दिलाने में आइये आपको बताते हैं । बात तक़रीबन दो दशक पहले की है तक़रीबन 1985-86 का दौर रहा होगा उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में एक विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव पारित हुआ पर स्थान चिन्हित नही किया गया  । मऊ, ग़ाज़ीपुर, मिर्ज़ापुर, सोनभद्र, गोरखपुर, बलिया,वाराणसी, मुगलसराय, जौनपुर ,आज़मगढ़ इत्यादि ज़िलों का एक शिक्षण केंद्र बनने जा रहा था अब समस्या थी भूमि चिन्हित करने की जहाँ इसे स्थापित किया जा सके । उस समय मऊ से ...

इसने ख़्वाब में मेरी माँ का रेप किया है, ठीक है इसकी परछाई को 100 कोड़े लगाओ

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एक बार एक आदमी किसी को खींचते हुवे लेकर चला आरहा था हज़रत अली अलैहिस्सलाम का उधर से गुज़र होरहा था । हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पूछा कहाँ से इसे इस तरह  ले जारहे हो ? उस शख़्स ने कहा या अली हम आपके ही पास अपना मुक़दमा लेकर आरहे थे । हज़रत अली अ. स. ने पूछा क्या माजरा है ? उस आदमी ने कहा या मौला अली इसने फलां शख़्स से कहा है कि इसने मेरी माँ के साथ ख़्वाब में ज़िना (रेप) किया है या अली अब आप ही इंसाफ करें । मौला अली ने फ़रमाया ठीक है इसे धूप में खड़ा करो और इसकी परछाई को 100 कोड़े लगाओ । उस शख़्स ने फ़रमाया या अली ये कैसे मुमक़िन है भला परछाई को कोड़े लगाने से इसे क्या चोट पहुँचेगी ? मौला अली ने फ़रमाया वही चोट इसे पहुँचेगी जो इसने ख़्वाब में तुम्हारे माँ के साथ ज़िना करके पहुंचाई है । वह शख़्स समझ गया कि हज़रत अली क्या कहना चाहते हैं उसने माफ़ी माँगी । हज़रत अली ने कहा ख़्वाब से किसी को कोई नुक़सान नही होता बस ख़्वाब ग़ुमराह कर देते हैं अपने ज़हन को पाक़ रखा करो वो दोनों वहाँ से चले गए । अब  हमारी अदालत का रुख़ करते हैं जहाँ किसी लड़की ने कह दिया इसने गंदे मैसेज करके मेरा शारिरिक शोषण करने की कोशि...